भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ३१६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दारुण सन्निपातरोग नष्ट होता है । इससे अनेक प्रकारकी खांसी और शिरोरोग नष्ट होते हैं । इसको कासकुठार रस कहते हैं ॥ ७४ ॥ चन्द्रामृत लोह । त्रिकटु त्रिफला धान्यं चव्यं जीरकसैन्धवम् । दिव्यौषधिहतस्यापि तत्तुल्यमयसो रजः ॥७५॥ नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् । प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा चिन्तयित्वाऽमृतेश्वरीम्॥७६॥ एकैकां वटिकां खादेद्रक्तोत्पलरसाप्लुताम् । नीलोत्पलरसेनैव कुलत्थस्वरसेन च ॥ ७७ ॥ निहन्ति विविधं कासं दोषत्रयसमुद्भवम् । वातिकं पैत्तिकञ्चैव गरदोषसमुद्भवम् ॥ ७८ ॥ सरक्तमथ नीरक्तं ज्वरं श्वाससमन्वितम् । भ्रमतृड्दाहशूलघ्नं रुच्यं वह्निप्रदीपनम् ॥ ७९ ॥ बलवर्णकरं वृष्यं जीर्णज्वरविनाशनम् । इदं चन्द्रामृतं लौहं चन्द्रनाथेन निर्मितम् ॥ ८० ॥ त्रिकुटा, त्रिफला, धनिया, चव्य, जीरा और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, मैनशिलके द्वारा मारा हुआ लोहा दश भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें खरल करके नौ नौ रत्तीक गोलियां बना लेवे । प्रातःकाल पवित्र होकर अमृतेश्वरीका ध्यान करके एक एक गोली लाल कमोदिनीके रसके द्वारा अथवा नीलोत्पलके रसके द्वारा, अथवा कुलथीके द्वारा सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे अनेक प्रकारकी खाँसी, त्रिदोषज कास, वातज कास, पित्तज कास, विषदोषोद्भव कास, रुधिरयुक्त कास, रक्तरहित कास, श्वास- युक्त ज्वर, भ्रम, तृषा, दाह और शूलरोग शमन होते हैं ।