भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 584 में से

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पृष्ठ 343

भाषाटीकासहित । ( ३१७ ) यह औषधि अतीव रुचिकारक, अग्निप्रदीपक, बल, वर्ण और वीर्य्यको बढ़ानेवाली तथा जीर्णज्वरको हरनेवाली है । इस चन्द्रामृत लोहको महादेवने कहा है ॥ ७५-८० ॥ श्रीचन्द्रामृत रस । रसगन्धकलौहानां प्रत्येकं कार्षिकं क्षिपेत् । टंकणस्य पलं दत्त्वा मरिचस्य पलार्द्धकम् ॥ ८१॥ त्रिकटु त्रिफला चव्यं धान्यजीरकसैन्धवम् । प्रत्येकं तोलकं ग्राह्यं छागीदुग्धेन पेषयेत् ॥ ८२ ॥ नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् । प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा चिन्तयित्वाऽमृतेश्वरीम्॥८३॥ एकैकां वटिकां खादेद्रक्तोत्पलरसेन च । नीलोत्पलरसेनापि कुलत्थस्वरसेन च ॥ ८४ ॥ छागीक्षीरेण मण्डेन केशराजरसेन च । निहन्ति विविधं कासं वातरक्तसमुद्भवम् ॥ ८५ ॥ वातश्लेष्मज्वरं कासं पित्तश्लेष्मज्वरं तथा । वातिकं पैत्तिकं वापि गरदोषसमन्वितम् ॥ ८६ ॥ वासा गुडूचिका भार्ङ्गी मुस्तकं कण्टकारिका । समभागकृतं क्वाथं प्रत्यहं भक्षयेदनु ॥ ८७ ॥ पारा, गन्धक और लोहाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे, सुहागा १ पल, काली मिरच आधा पल, त्रिकुटा, त्रिफला, चव्य, धनिया, जीरा और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे, सबको एकत्र खरल करके बकरीके दूधमें पीस- कर नौ नौ रत्तीकी बराबर गोली बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल

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