रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मलमूत्रादिसे शुद्ध होकर और अमृतेश्वरी देवीका ध्यान करके एक एक गोली खाये । रक्तोत्पलका रस, नीलोत्पलका रस, कुथलीका क्वाथ, बकरीका दूध, मांड और कुकुरभांगरेका रस इनमेंसे एक किसी अनुपानके साथ सेवन करनेसे अनेक प्रकारकी खाँसी, वात- रक्तोत्पन्न खाँसी, वातश्लेष्म ज्वर, पित्तश्लेष्म ज्वर, वातिक ज्वर, पैत्तिक ज्वर और विषदोषसमन्वितज्वर यह सब नष्ट होते हैं । अड़ू- सा, गिलोय, भारंगी, नागरमोथा और कटेरी इनको समान भाग लेकर क्वाथ बनाकर ऊपरसे पान करे ॥ ८०-८७ ॥ अमृतमञ्जरी । हिंगुलञ्च विषञ्चैव कणा मरिचटङ्कणम् । जातीकोषं समं सर्वं जम्बीररसमर्दितम् ॥ ८८ ॥ रक्तिमानां वटीं कुर्यादार्द्रकरससंयुताम् । वटीद्वयं त्रयं खादेत्सन्निपातं सुदारुणम् ॥ ८९ ॥ अग्निमांद्यमजीर्णञ्च सामवातं सुदारुणम् । उष्णतोयानुपानेन सर्व व्याधिं नियच्छति ॥ ९० ॥ कासं पञ्चविधं श्वासं सर्वाङ्गग्रहमेव च । जीर्णज्वरं क्षयं चैव हन्यादमृतमञ्जरी ॥ ९१ ॥ सिंग्रफ, विष, पीपल, काली मिरच, सुहागा और जावित्री इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बनाकर अदरखके रसके साथ दो अथवा तीन गोली सेवन करनेसे दारुण सन्निपात, मन्दाग्नि, अजीर्ण और आमवात रोग नष्ट होते हैं । गरम जलके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग शमन होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे पांच प्रकारकी खांसी, श्वास, सर्वांगपीड़ा, जीर्णज्वर और क्षय दूर होते हैं । इसको अमृतमञ्जरी वटी कहते हैं ॥ ८८-९१॥