भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ३२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागा, नागकेशर, कपूर, जावित्री, लौंग, तेजपात और सुवर्णकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष, कृष्णाभ्रक भस्म ४ कर्ष, तालीशपत्र, नागरमोथा, कूठ, वालछड़, दारचीनी, धायके फूल, इलायची, त्रिकुटा, त्रिफला और गजपीपल यह प्रत्येक औषधि दो दो कर्ष लेवे । सबको एकत्र पीसकर पीपलके क्वाथमें खरल करके दालचीनीके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करनेसे मन्दाग्नि, अरुचि, पांडु, कामला, उदररोग, शोथ, आनाह, ज्वर, संग्रहणी, श्वास, खाँसी और राजयक्ष्मारोग यह सब नष्ट होते हैं । इससे अनेक प्रकारके रोग दूर होकर बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है । प्रतिदिन इस औषधिके सेवन करनेसे मनुष्य रोगरहित हो जाते हैं । इसको बृहच्छृङ्गाराभ्र कहते हैं ॥ ९३-९९ ॥ नित्योदय रस । सुशुद्धं पारदं गन्धं प्रत्येकं शुक्तिसम्मितम् । ततः कज्जलिकां कृत्वा मर्दयेच्च पृथक्पृथक् ॥१००॥ बिल्वाग्निमन्थश्योनाकं काश्मरी पाटला बला । मुस्तं पुनर्नवा धात्री बृहती वृषपत्रकम् ॥ १०१ ॥ विदारी बहुपुत्री च एषां कर्षै रसैर्भिषक् । सुवर्णं रजतं ताप्यं प्रत्येकं शाणमात्रकम् ॥ १०२ ॥ पलमात्रं तु कृष्णाभ्रं तदर्द्धन्तु सिताभ्रकम् । जातीकोषफले मांसी तालीशैलालवंगकम् ॥१०३॥ प्रत्येकं कोलमात्रन्तु वासानीरैर्विमर्दयेत् । शोषयित्वाऽऽतपे पश्चाद्विदार्याः पेषयेद्रसैः॥१०४॥ द्विगुंजां वटिकां कृत्वा पिप्पलीमधुना भजेत् । नाम्ना नित्योदयश्चायं रसो विष्णुविनिर्मितः॥१०५॥ १ सिताह्वयम्-इत्यपि केचित पठन्ति ।