रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्च कासान्निहन्त्याशु चिरकालोद्भवानपि । राजयक्ष्माणमप्युग्रं जीर्णज्वरमरोचकम् ॥१०६॥ धातुस्थं विषमाख्यञ्च तृतीयकचतुर्थकौ । अर्शांसि कामलां पाण्डुमग्निमान्द्यं प्रमेहकम् । सेवनादस्य कन्दर्परूपो भवति मानवः ॥१०७॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे कासाधिकारः । शुद्ध पारा ६ मासे और गन्धक ६ मासे दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर बेलकी जड़, अरणी, सोनापाठा, कुम्भीर, पाढल, खिरैंटी, नागरमोथा, पुनर्नवा, आमले, बड़ी कटेरी, अडूसेके पत्ते, विदारीकंद और सतावर इन प्रत्येकके एक एक कर्ष परिमाण रसके द्वारा अलग अलग खरल करे । पश्चात् इसमें सुवर्णकी भस्म ४ मासे, चांदीकी भस्म ४ मासे, सोनामाखीभस्म ४ मासे, कृष्णाभ्रकभस्म ४ तोले, कपूर २ तोले, जावित्री, जायफल, बालछड़, तालीशपत्र, इलायची और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला मिलाकर अडूसेके रसमें खरल करके धूपमें सुखा देवे । फिर दुवारा विदारीकंदके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे पांच प्रकारकी बहुत दिनोंकी पुरानी खाँसी, राजयक्ष्मा, जीर्ण- ज्वर, अरुचि, धातुगत विषमज्वर, तृतीयक और चातुर्थिक ज्वर, बवासीर, कामला, पांडु, मंदाग्नि और प्रमेह रोग नष्ट होते हैं। इस औषधिके सेवन करनेसे मनुष्य कामदेवके समान रूपवान् हो जाता है । यह नित्योदय रस विष्णु भगवान्ने कहा है ॥ १००-१०७ ॥ इति कासाधिकार समाप्त ।