भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 348

( ३२२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ हिक्काश्वासाधिकार । सूर्यावर्त्त रस । सूतकं गन्धकं मर्द्यं यामैकं कन्यकाद्रवैः । द्वयोस्तुल्यं ताम्रपत्रं पूर्वकल्केन लेपयेत् ॥ १ ॥ दिनैकं हंडिकायन्त्रे पचेच्छीतं समुद्धरेत् । सूर्यावर्त्तरसो नाम द्विगुञ्जः श्वासकासनुत् ॥ २ ॥ इन्द्रवारुणिकामूलं देवदारु कटुत्रयम् । शर्करासहितं खादेदूर्ध्वश्वासनिवृत्तये ॥ ३ ॥ प्रथम पारे और गंधक दोनोंको घृतकुमारी ( घीकार ) के रसमें खरल करे, पश्चात् पारे और गंधक दोनोंकी बराबर तांबेके पत्र लेकर उनपर उक्त गंधक और पारेके कल्कका लेप कर देवे । फिर इन तांबेके पत्तोंको एक हांडीमें रखकर उसको सराव या अभ्रकसे ढककर बालूसे हांडीको भरकर एक दिन तक पकावे । पश्चात् शीतल होनेपर चूर्ण करके दोरत्ती परिमाण औषधि सेवन करनेसे श्वास और खांसी दूर होती है । इसको सूर्यावर्त्त रस कहते हैं । इन्द्रायणकी जड़, देव- दारु और त्रिकुटा इन सबको एकत्र पीसकर मिश्री मिलाकर सेवन करनेसे ऊर्ध्वश्वास दूर हो जाता है ॥ १-३ ॥ विजयवटी । सूतकं गन्धकं लौहं विषमभ्रकमेव च । विडङ्गं रेणुकं मुस्तमेला ग्रन्थिककेशरम् ॥ ४ ॥ त्रिकटु त्रिफला तालं शुल्वं जैपालचित्रकम् । एतानि समभागानि द्विगुणो दीयते गुडः ॥ ५ ॥ कासे श्वासे क्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे ।