भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 349

भाषाटीकासहित । ( ३२३ ) सूतायां ग्रहणीदोषे शूले पाण्ड्वामये तथा । हस्तपादादिदाहेषु वटिकेयं प्रशस्यते ॥ ६ ॥ पारा, गंधक, लोहभस्म, विष, अभ्रकभस्म, वायविडंग, रेणुका, नागरमोथा, इलायची, पीपलामूल, नागकेशर, त्रिकुटा, त्रिफला, तांबाभस्म, शुद्ध जमालगोटे और चीतेकी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सबसे दोगुना पुराना गुड़ लेवे । इन सबको एकत्र खरल करके सेवन करनेसे खांसी, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषम- ज्वर, सूतिका, संग्रहणी, शूल, पांडु और हाथ पांव आदिकी दाह दूर होती है । इसको विजयवटी कहते हैं ॥ ४-६ ॥ घृतेन पाचयेन्मूलं पत्रञ्च वासकस्य तु । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय कासे श्वासे क्षये तथा ॥ ७ ॥ अडूसेकी जड़ और अडूसेके पत्तोंको घृतमें भूनकर प्रातःकाल सेवन करनेसे खाँसी, श्वास और क्षयरोग नष्ट होते हैं ॥ ७ ॥ शुण्ठीचूर्णं समं देयं पिप्पली देवदारु च । ऊर्ध्वश्वासं सदा हन्ति पिबेदुष्णजलेन च ॥ ८ ॥ पीपल, देवदारु और सोंठके चूर्णको गरम जलके साथ सेवन करनेसे उर्ध्वश्वास नष्ट होता है ॥ ८ ॥ लोहपर्पटी रस । भागौ रसस्य गन्धस्य द्वावेको लौहभस्मतः । एतद् घृष्टं द्रवीभूतं मृद्वग्नौ कदलीदले ॥ ९ ॥ पातयेद्गोमयगते तथैवोपरि योजयेत् । ततः पिष्ट्वा द्रवैरेभिः सप्तधा भावयेत्पृथक् ॥ १० ॥ भार्ङ्गी मुण्डी मुनिवरा जया निर्गुण्डिका तथा । व्योषवासककन्यार्द्रद्रवैरेताः पुटे पचेत् ॥ ११ ॥