भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 584 में से

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( ३२४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आगन्धं खर्परे ताम्रे पर्पटाख्यो रसो भवेत् । सर्वरोगहरस्तैस्तैरनुपानैर्हि माषकैः ॥ १२ ॥ ताम्बूलीपत्रसहितः श्वासकासहरः परः । सकणः सुरसाक्वाथोऽनुपानं वासकाजलम् ॥ १३ ॥ अम्लिकातैलवार्त्ताकुकूष्माण्डं कदलीफलम् । वर्ज्यं मांसरसं सर्वं पथ्यं दद्याद्विचक्षणः ॥ वर्जयेच्च विशेषेण कफकृत्स्त्रीसुखादिकम् ॥ १४ ॥ पारा दो भाग, गंधक २ भाग और लोहेकी भस्म १ भाग इन सबको एकत्र खरल करके एक लोहेकी करछीमें रखकर उसमें घी मिलाकर मंद मंद अग्निसे पकावे । जब खूब गल जाय तब गोबरके ऊपर एक केलेका पत्ता रखकर उसके ऊपर उक्त औषधि ढाल देवे और ऊपरसे एक केलेका पत्ता रखकर पत्तेके ऊपर गोबर डालकर ढक देवे । और उसको अच्छे प्रकारसे दबाकर पर्पटीके समान बना लेवे । फिर इसका चूर्ण करके भारंगी, गोरखमुंडी, अगस्तियाके पत्ते, त्रिफला, जयंती, सम्हालू, त्रिकुटा, अडूसा, घीक्वार और अदरक इन प्रत्येकके रसके द्वारा सात सात भावना देकर तांबेके पात्रमें जबतक उसकी गंध दूर न होवे तब तक पकावे । इस औषधिमेंसे एक मासा लेकर यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे सब रोग नष्ट होते हैं। पानके साथ इस औषधिके भक्षण करनेसे श्वास और खाँसी दूर होती है, तुलसीके क्वाथ और पीपलके चूर्णके साथ अथवा अडूसेके रसके साथ इस औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन कर- नेके अन्तमें खट्टे पदार्थ, तेल, बैंगन, पेठा और केलेकी फली भक्षण न करे । कफकारक पदार्थ और स्त्रीसंगका त्याग कर देवे । इसपर सब प्रकारके मांसरस पथ्य देवे। इसको लोहपर्पटी रस कहते हैं ॥ ९-१४ ॥ ताम्रपर्पटी । लौहस्थाने ताम्रयोगात्ताम्रपर्पटिका भवेत् ॥ १५ ॥

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