रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । श्वासकासचिन्तामणि रस । पारदं माक्षिकं स्वर्णं समांशं परिकल्पयेत् । पारदार्द्धं मौक्तिकञ्च सूताद्विगुणगन्धकम् ॥ अभ्रञ्चैव तथा योज्यं व्योम्नो द्विगुणलौहकम् ॥ १९॥ कण्टकारीरसेनैव छागीदुग्धैः पृथक् पृथक् । मधुयष्टिरसेनैव पर्णपत्ररसेन च ॥ २० ॥ भावयेत्सप्तवारञ्च द्विगुञ्जां वटिकां भजेत् । पिप्पलीमधुसंयुक्तां श्वासकासविमर्दिनीम् ॥ २१॥ पारा, सोनामाखीभस्म और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, मोती आधा भाग, गंधक २ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग और लोहभस्म ४ भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कटेरीके रस, बकरीके दूध, मुलैठीके रस और पानोंके रसमें अलग अलग सात २ भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। पीपलके चूर्ण और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे खाँसी और श्वास दूर होते हैं। इसको श्वासकासचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ १९-२१॥ अन्य श्वासकुठार रस । रसं गन्धं विषं टङ्कं शिलोषणकटुत्रयम् । सर्वं संमर्द्य दातव्यो रसः श्वासकुठारकः ॥ वातश्लेष्मसमुद्भूतं श्वासं कासं क्षयं जयेत् ॥ २२ ॥ पारा, गंधक, विष, सुहागा, मैनशिल, काली मिरच और त्रिकुटा यह सब औषधि समान भाग लेकर पीसकर सेवन करनेसे वात- कफोत्पन्न रोग, श्वास, खाँसी और क्षयरोग नष्ट होते हैं। इसको श्वासकुठार रस कहते हैं ॥ २२ ॥ अन्य श्वासकुठार रस । रसं गन्धं विषञ्चैव टङ्कणं समनःशिलम् ।