रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 353, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३२७ ) एतानि समभागानि मरिचं तच्चतुर्गुणम् ॥ २३ ॥ त्रिभागं त्र्यूषणं ज्ञेयं खल्ले सर्वं विचूर्णयेत् । रसः श्वासकुठारोऽयं द्विगुञ्जः श्वासकासजित् ॥२४॥ गता संज्ञा यदा पुंसां तदा नस्यं प्रदापयेत् । घ्रापयेन्नासिकारन्ध्रे संज्ञाजननमुत्तमम् ॥ २५ ॥ प्रतिश्यायं क्षयक्षीणमेकादशविधं क्षयम् । हृद्रोगं श्वासशूलञ्च स्वरभेदं सुदारुणम् ॥ सन्निपातं तथा घोरं तन्द्रामोहान्वितं जयेत् ॥ २६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे हिक्काश्वासाधिकारः । शुद्ध पारा, गंधक, विष, सुहागा और मैनशिल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, कालीमिरच ४ भाग और त्रिकुटा ३ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बनाकर सेवन करनेसे श्वास और खांसी दूर होती है । जिस मनुष्यकी संज्ञा नष्ट होजाय उसको यह गोली जलमें पीसकर नासिकाके छिद्रमें नस्य देवे । अथवा नासिकाके छिद्रद्वारा इस औषधिकी गंध देवे, इसके सेवन करनेसे प्रतिश्याय, क्षयक्षीण, एकादश प्रकारका क्षय, हृदयरोग, श्वास, शूल, स्वरभेद, मोह और तन्द्रायुक्त सन्निपात ज्वर दूर होते हैं । इसको श्वासकुठार रस कहते हैं ॥ २३-२६ ॥ इति हिक्काश्वासाधिकार समाप्त । अथ स्वरभेदचिकित्सा । भैरव रस । रसं गन्धं विषं टङ्कं मरिचं चव्यचित्रकम् । आर्द्रकस्य रसेनैव संमर्द्य वटिकां ततः ॥ १ ॥