रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गुञ्जात्रयप्रमाणेन खादेत्तोयानुपानतः । स्वरभेदं निहन्त्याशु श्वासं कासं सुदुस्तरम् ॥ २ ॥ पारा, गंधक, विष, सुहागा, कालीमिरच, चव्य और चित्रककी जड़ इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर अदरखके रसमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोली बना जलके साथ सेवन करनेसे स्वरभेद, श्वास और कास रोग नष्ट होते हैं । इसको भैरव रस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ चव्यादि चूर्ण । चव्याम्लवेतसकटुत्रयतिन्तिडीकतालीशजीरक- तुगादहनैः समांशैः । चूर्णं गुडप्रमृदितं त्रिसुग- न्धियुक्तं वैस्वर्यपीनसकफारुचिषु प्रशस्तम् ॥ ३ ॥ चव्य, अम्लवेत, त्रिकुटा, तिन्तिडीक, तालीशपत्र, जीरा, वंश- लोचन, चित्रककी जड़, दारचीनी, इलायची और तेजपात यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और गुड़ सबकी बराबर लेवे । सबको एकत्र मिलाकर स्वरभेद, पीनस, कफ और अरुचि रोगमें प्रयोग करे । इसको चव्यादि चूर्ण कहते हैं ॥ ३ ॥ अनेनैवानुपानेन भस्मसूतं प्रयोजयेत् । योगवाहिरसञ्चापि योजयन्ति भिषग्वराः ॥ ४ ॥ सशर्करं शुण्ठिचूर्णं क्षौद्रेण सह योजितम् । कोकिलस्वर एव स्याद्गुटिकाभुक्तमात्रतः ॥ ५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे स्वरभेदाधिकारः । इसी उपरोक्त चव्यादि चूर्णके साथ रससिन्दूर और योगवाही अन्यान्य समस्त औषधियोंका प्रयोग करे । मिश्री, सोंठका चूर्ण और सहद इनको एकत्र मिलाकर गोली बनाकर सेवन करनेसे स्वर कोकि- लके समान हो जाता है ॥ ४॥५॥ इति स्वरभेदाधिकार समास ॥