रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 355, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३३९ ) अथारोचकचिकित्सा । सुधानिधि रस । रसगन्धौ समौ शुद्धौ दन्तीक्वाथेन भावयेत् । जम्बीरस्य रसेनैव आर्द्रकस्य रसेन च ॥ १ ॥ मातुलुङ्गस्य तोयेन तस्य मज्जारसेन च । पश्चाद्विशोष्य सर्वांस्तान् टंकणञ्चोपचारयेत् ॥ २ ॥ देवपुष्पं बाणमितं रसपादं मृतामृतम् । माषमात्रञ्च तत्सर्वं नागरेण गुडेन वा ॥ ३ ॥ सर्वारोचकशूलार्तिसामवातं सुदारुणम् । विषूचीञ्चाग्निमान्द्यं च भक्तद्वेषञ्च दारुणम् ॥ रसोऽयं वारयत्याशु केसरी करिणं यथा ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा १ भाग, गंधक १ भाग इन दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर जम्भीरी नींबूका रस, अदरखका रस, बिजौरे नींबूका रस और बिजौरे नींबूकी मज्जाके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर पश्चात् इसमें सुहागा ५ भाग, लौंग ५ भाग और पारेसे चौथाई भाग शुद्ध विष मिला लेवे । इसमेंसे एक मासा औषधि लेकर सोंठके चूर्णके साथ अथवा गुड़के साथ सेवन करनेसे सब प्रकारकी अरुचि, शूल, आमवात, विषूचिका, मंदाग्नि प्रभृति रोग नष्ट होते हैं । इसको सुधानिधि रस कहते हैं ॥ १-४ ॥ सुलोचनाभ्र । पलं सुजीर्णं गगनं तु वज्रकं तेजोवती कोलमुशीर- दाडिमम् । धात्र्यम्लरोलीरुचकं पृथग्दशपलो- न्मतं मर्दितमेव सेवितम् ॥ ५ ॥ अरोचकं