भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

भाषाटीकासहित । ( ३३३ ) मूर्च्छा रोगमें पीपलके चूर्ण और रससिन्दूरको सहतमें मिलाकर सेवन करे । इस रोगपर शीतल जलका परिषेक (सेचन), शीतल जलमें अवगाहन और अन्यान्य समस्त शीतल वस्तुओंका सेवन करे । इसको सुधानिधि रस कहते हैं । यह औषधि मूर्च्छा रोगको नष्ट करती है ॥१॥ इति मूर्च्छारोगाधिकार समाप्त । अथ मदात्ययरोगचिकित्सा । सचव्यं हिंगुरुचकं धान्याकं विश्वदीप्यकम् । चूर्णं ससूतं मद्येन पीतं पानात्ययं जयेत् ॥ १ ॥ चव्य, हींग, काला नमक, धनिया, सोंठ, अजवायन और रस- सिन्दूर यह सब औषधि समान भाग लेकर बारीक चूर्ण कर लेवे । इसको मदिराके साथ सेवन करनेसे मदात्यय रोग नष्ट होता है ॥१॥ अष्टाङ्गलवण । सौवर्चलमजाज्यश्च वृक्षाम्लं साम्लवेतसम् । त्वगेला मरिचार्धांशं शर्करामधुयोजितम् ॥ २ ॥ हितं लवणमष्टांगमग्निसन्दीपनं परम् । मदात्यये कफप्राये दद्यात्स्रोतोविशोधनम् ॥ ३ ॥ इति मदात्ययाधिकारः । काला नमक, जीरा, चूका, अमलवेत, दालचीनी, इलायची और काली मिरच यह सब औषधि समान भाग लेकर मिश्री और सहत आधा आधा भाग मिलाकर सेवन करनेसे कफजनित मदात्यय रोग नष्ट होता है । इसको अष्टाङ्गलवण कहते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे रोग नष्ट होकर अग्नि संदीप्त होती है और रुधिरके स्रोत शुद्ध होते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ इति मदात्ययरोगचिकित्सा ॥ १२