भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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पृष्ठ 358

( ३३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कुमुदेश्वर रस । मृतताम्रस्य भागौ द्वौ भागैकं वङ्गभस्मकम् । यष्टीमधुरसैर्भाव्यं शुष्कं माषार्द्धकं शुभम् ॥ ३ ॥ सेव्यं चैवानुपानेन वक्ष्यमाणेन बुद्धिमान् । चन्दनं शारिवा मुस्तं क्षुद्रैलानागकेशरम् ॥ ४ ॥ सर्वतुल्या तथा लाजा पचेत्षोडशिकैर्जलैः । अर्धशेषं हरेत्क्वाथं सिताक्षौद्रयुतं तु तत् ॥ छर्दिं तृष्णां निहन्त्याशु रसोऽयं कुमुदेश्वरः ॥ ५ ॥ इति तृष्णाधिकारः । तांबेकी भस्म २ भाग, वंगकी भस्म १ भाग इन दोनोंको एकत्र पीसकर मुलैठीके क्वाथकी सात भावना देवे । पश्चात् आधे आधे मासेकी गोली बनाकर सेवन करे और ऊपरसे चन्दन, अनन्तमूल, नागरमोथा, छोटी इलायची और नागकेशर यह सब समान भाग और सबकी बराबर खीलें लेवे, सबको एकत्र करके सोलह गुने जलमें पकावे । जब पकते पकते जल आधा भाग बाकी रह जाय तब उतार लेवे, फिर उसको शीतल करके मिश्री और सहत डालकर पान करे । यह कुमुदेश्वर रस वमन और तृषाको शांत करता है ॥ ३-५ ॥ इति तृष्णाधिकार समाप्त । अथ मूर्च्छारोगचिकित्सा । सुधानिधि रस । कणामधुयुतं सूतं मूर्च्छायामनुशीलयेत् । शीतसेकावगाहादि सर्वं वा शीतलं भजेत् । सुधानिधिरसो नाम मदमूर्च्छाविनाशनः ॥ १ ॥ इति मूर्च्छाधिकारः ।