भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

भाषाटीकासहित । ( ३३१ ) अथ छर्दिरोगचिकित्सा । अजाजीधान्यपथ्याभिः सक्षुद्राभिः कटुत्रिकैः । एभिः सार्द्धं भस्मसूतः सेव्यो वान्तिप्रशान्तये ॥१॥ ( हिक्काधिकारोक्तपिप्पल्यादिलौहमत्र विधेयम् ) इति छर्दिरोगचिकित्सा । जीरा, धनिया, हरड़, कटेरी, सोंठ, मिर्च, पीपल समानभाग लेकर पारा भस्म या रससिन्दूर सबसे व्योढ़ा सेवन करनेसे वमनरोग शांत होता है । ( वमनरोगमें हिक्काधिकारोक्त पिप्पल्यादि लोह व्यवहार करना चाहिये ) । [ इस योगमें पारदभस्म अधिक है अतः सब समान भाग लें तो ठीक होगा ] ॥ १ ॥ इति छर्द्यधिकार समाप्त । अथ तृष्णारोगचिकित्सा । महोदधि रस । ताम्रं चक्रिकया वङ्गं सूतं तालं सतुत्थकम् । वटांकुररसैर्भाव्यं तृष्णाहृद्वल्लमात्रतः ॥ १ ॥ सक्षौद्रमाम्रजम्बूत्थं पिबेत्क्वाथं पलोन्मितम् । सकृष्णमधुना कुर्याद्गण्डूषं शीतले स्थितः ॥ २ ॥ तांबाभस्म, वंगभस्म, पारा, हरतालभस्म और शुद्ध तूतिया यह सब औषधि समान भाग लेवे, सबको एकत्र पीसकर वड़के अंकुरके रसमें भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियां बनाकर सेवन करनेसे तृषा रोग शांत होता है । इसके सेवन करनेके पश्चात् आम और जामुनकी छालके क्वाथमें सहत डालकर एक पल परिमाण सेवन करे । और जो इस रोगमें शीत अधिक हो अथवा शीत स्थानमें हो तो इसमें पीपलका चूर्ण और सहतके गण्डूष धारण करे ॥ १ ॥ २ ॥