रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३३९ ) सर्वांस्तान्नाशयत्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा । चतुर्भुजरसो नाम महेशेन प्रकाशितः ॥ २६ ॥ रससिन्दूर २ भाग, सोनेकी भस्म १ भाग, मैनशिल १ भाग, कस्तूरी १ भाग और हरिताल १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके घीक्वारके रसमें एक दिनतक खरल करे, फिर इसका गोलासा बनाकर एरण्डके पत्तोंमें लपेटकर धानोंके ढेरमें रख देवे; पश्चात् तीन दिनके उपरान्त निकालकर सब रोगोंमें प्रयोग करे । यह उत्तम औषधि यथोचितमात्रानुसार त्रिफलेके काथ और सहतके साथ सेवन करनेसे वलीपलित, अपस्मार, ज्वर, खाँसी, शोष, मन्दाग्नि, क्षय, हस्तकम्प, शिरःकम्प और शरीरकम्पप्रभृति रोग नष्ट होते हैं । इसका वातज, पित्तज और सम्पूर्ण कफके रोगोंमें प्रयोग करे । सर्व प्रकारकी वमन विरेचन और मन्त्रौषधिके द्वारा जो रोग शमन नहीं होते वे रोग इस औषधिके भक्षण करनेसे वज्राहत वृक्षके समान अवश्य नष्ट हो जाते हैं । यह चतुर्भुजरस स्वयं महादेवने कहा है ॥ २०-२६ ॥ उन्मादपर्पटी रस । कृष्णधुस्तूरजैर्बीजैः पञ्चभिः पर्पटीरसः । सम्प्रयोज्यः प्रशान्त्यर्थमुन्मादं भूतसम्भवम् ॥२७॥ इत्युन्मादाधिकारः । काले धतूरेके पांच बीजोंको पित्तपापड़ेके रसमें पीसकर सेवन करनेसे भूतोन्माद रोग नष्ट होता है । इसको उन्मादपर्पटी रस कहते हैं ॥ २७ ॥ इत्युन्मादाधिकारः ।