रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३४१ ) स्नुह्यग्निविजयेरण्डवचानिष्पावशूरणैः । निर्गुण्ड्याश्च द्रवैर्मर्द्यं तद्गोलं पाचयेत्पुनः ॥ ६ ॥ कङ्गनीसर्षपोत्थेन तैलेन गन्धसंयुक्तम् । ततः पक्त्वा समुद्धृत्य चणमात्रा वटी कृता ॥ ७ ॥ इन्द्रब्रह्मवटी नाम भक्षयेदार्द्रकद्रवैः । दशमूलकषायञ्च कणायुक्तं पिबेदनु ॥ अपस्मारं जयत्याशु यथा सूर्योदये तमः ॥ ८ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, रूपाभस्म, सोनामाखी भस्म, विष और कमलकेशर यह सब औषधि समान भाग लेकर थूहरके दूध, चीतेकी जड़के रस, भांगके पत्तोंके रस, एरण्डीकी जड़का रस, वचका रस, सेमका रस, जमीकंदका रस और सम्हालूके पत्तोंका रस इन सबमें एक एक दिन तक खरल करके पिंडाकार बनाकर पुटपाक करे । फिर उसमें १भाग गंधक मिलाकर कंगुनीके तेल और सरसोंके तेलमें पीसकर दुबारा पुटपाक करे । पश्चात् चनेकी बराबर गोली बनाकर अदरखके रसके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेवनके अन्तमें पीपलका चूर्ण दशमूलके क्वाथमें डालकर पान करे । जिसप्रकार सूर्यके उदय होनेसे अंधकारका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे अपस्माररोग नष्ट होता है ॥ ६-८ ॥ वातकुलान्तक रस । मृगनाभिशिवा नागकेशरं कलिवृक्षजम् । पारदं गन्धकं जातीफलमेलालवङ्गकम् ॥ ९ ॥ प्रत्येकं कार्षिकञ्चैव श्लक्ष्णचूर्णञ्च कारयेत् । जलेन मर्दयित्वा तु वटीं कुर्याद्विरक्तिकाम् ॥ १०॥ यथाव्याध्यनुपानेन योजयेच्च चिकित्सकः । अपस्मारे महाघोरे मूर्च्छारोगे च शस्यते ॥ ११ ॥