रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वातजान् सर्वरोगांश्च हन्यादचिरसेवनात् । नातः परतरं श्रेष्ठमपस्मारेषु वर्त्तते ॥ ब्रह्मणा निर्मितः पूर्व्वं नाम्ना वातकुलान्तकः ॥ १२॥ कस्तूरी, हरड़, नागकेशर, बहेड़ा, पारा,गंधक, जायफल, इलायची और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेकर जलमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंको यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे अपस्मार और मूर्च्छारोग नष्ट होते हैं। इस औषधिको थोड़ेही दिन सेवन करनेसे सर्व प्रकारका वातरोग नष्ट होता है। अपस्मारको दूर करनेवाली इसकी समान अन्य औषधि नही है। इस वातकुलान्तक रसको स्वयं ब्रह्मदेवने कहा है ॥ ९-१२ ॥ पाषाणवज्र रस । रसं वज्रं हेम तारं मौक्तिकं तालमेव च । गन्धकं रसभस्मैव खर्परं च मनःशिला ॥ १३ ॥ मृताभ्रकं कान्तभस्म रुधिरं नागभस्मकम् । एतेषां तोलकैर्भागैः पुटं दद्याद्गजाव्हके ॥ १४ ॥ पाषाणे विमले पात्रे घर्षयेच्च प्रयत्नतः । ब्राह्मी जयन्ती निर्गुण्डी नागवल्ल्या रसैस्तथा॥१५॥ दिनमणिकरजालैः शोषयेच्च पुनः पुनः । ततश्च गोलकं कृत्वा स्थापयेत्कदलीदले ॥ १६ ॥ समुद्धृत्यापि गुटिकां नीहारे सूर्य्यसंकुले । एकद्वित्रिचतुर्थं वा स्थापनीयं यथाविधि ॥ १७ ॥ मर्दयित्वा वटी कार्या द्विगुञ्जाफलसंमिता । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय सर्वरोगकुलान्तकृत् ॥ १८ ॥