रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । क्षीराज्यशर्कराभिश्च शाल्यन्नं पथ्यमाचरेत् । कम्पवातप्रशान्त्यर्थं निर्वीते निवसेत्सदा ॥ द्विगुणाख्यरसो नाम त्रिपक्षात्कम्पवातजित् ॥ ३ ॥ गंधक १ भाग और पारा २ भाग इन दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली बना लेवे, फिर थोड़ी देरतक मंद मंद अग्निसे पकाकर चूर्ण कर लेवे, पश्चात् पारे और गंधक दोनोंके बराबर हरड़का चूर्ण मिला- कर सात रत्ती परिमाण भक्षण करे । यह सात रत्तीकी पहिले दिनकी मात्रा है । दूसरे दिन आठ रत्ती, तीसरे दिन नौ रत्ती इसी क्रमसे प्रति- दिन एक एक रत्ती बढ़ाकर इसका सेवन करे । जब बढ़कर २१ रत्ती परिमाण हो जाय तब फिर आगेको नहीं बढ़ावे । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें दूध, घी और मिश्री मिलाकर शालि चावलोंका भात खाय । कम्पवातको दूर करनेके लिये रोगीको सदैव वायुरहित स्थानमें निवास करावे । इसके सेवन करनेसे तीन पक्षमें कम्पवात रोग नष्ट होता है । इसको द्विगुणाख्यरस कहते हैं ॥ १-३ ॥ वातगजाङ्कुश । मृतं सूतं मृतं लौहं ताप्यं गन्धकतालकम् । पथ्या भृङ्गी विषं व्योषमग्निमन्थञ्च टङ्कणम् ॥ ४ ॥ तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्यं मुण्डीनिर्गुण्डिकाद्रवैः । द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ॥ ५ ॥ कणाचूर्णयुतञ्चैव जिंगीक्वाथं पिबेदनु । साध्यासाध्यं निहन्त्याशु रसो वातगजांकुशः ॥ ६॥ सप्ताहाद्गृध्रसीं हन्ति दारुणं सन्निपातिकम् । क्रोष्टुशीर्षकवातञ्चाप्यपबाहुकसंज्ञकम् ॥ ७ ॥