भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ३४५ ) मन्यास्तम्भमुरुस्तम्भं हनुस्तम्भं विनाशयेत् । पक्षाघातादिरोगेषु कथितः परमोत्तमः ॥ ८ ॥ रससिन्दूर, लोहा, सोनामाखी, गंधक, हरिताल, हरड़, काकड़ा- शिंगी, विष, त्रिकुटा, अरणी और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर गोरखमुंडी और सम्हालूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । सब प्रकारके वातरोगोंको शमन करनेके लिये जो इस औषधिका भक्षण करे तो इसके ऊपर पीपलका चूर्ण डाल- कर जिंगीके क्वाथका पान करे । इससे साध्यासाध्य वातरोग दूर होते हैं, एक सप्ताहमें गृध्रसी रोग दूर होता है । सन्निपात, क्रोष्टुशीर्ष, वात- रोग, अपबाहुक वातरोग, मन्यास्तम्भ, ऊरुस्तम्भ और हनुस्तम्भ रोग नष्ट होते हैं । पक्षाघातादि रोगोंमें यह औषधि अतीव हितकारी है । इसको वातगजांकुश रस कहते हैं ॥ ४-८ ॥ रसो वारिशोषणोऽत्र युक्तोऽन्यो योगवाहिकः ॥ ९ ॥ वातव्याधि रोगमें वारिशोषण रस और अन्यान्य योगवाही रसोंका भी प्रयोग करना चाहिये ॥ ९ ॥ बृहद्वातगजांकुश रस । सूताभ्रतीक्ष्णकान्तानि ताम्रतालकगन्धकम् । स्वर्णं शुण्ठी बला धान्यं कट्फलञ्चाभया विषम् ॥ पथ्या शृङ्गी पिप्पली च मरिचं टङ्कणं तथा ॥१०॥ तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्यं मुण्डीनिर्गुण्डिजैर्द्रवैः । द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ॥ साध्यासाध्यं निहन्त्याशु बृहद्वातगजांकुशः ॥११॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, कान्तलोहभस्म, तांबा- भस्म, हरितालभस्म, गन्धक, सोनाभस्म, सोंठ, खिरैंटी, धनिया,