भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ३४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कायफल, हरड़, विष, छोटी हरड़, काकड़ासिंगी, पीपल, काली मिरच और सुहागा यह सब औषधि समान भाग लेकर गोरखमुंडी और सम्हालूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इससे साध्यासाध्य सब प्रकारका वात रोग नष्ट होता है । इसको वृहद्वात- गजांकुश रस कहते हैं ॥ १०-११ ॥ महावातगजांकुश रस । मृताभ्रतीक्ष्णताम्रञ्च सूततालकगन्धकम् । भार्गी शुण्ठी बला धान्यं कट्फलञ्चाभया विषम् १२ संपिष्य चपलाद्रावैर्निष्केकां भक्षयेद्वटीम् । वातश्लेष्महरो ह्येष महावातगजांकुशः ॥ १३ ॥ अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, तांबाभस्म, पारा, हरिताल, गंधक, भारंगी, सोंठ, खिरैंटी, धनिया, कायफल, हरड और विष इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीपलके क्वाथमें खरल करके एक एक निष्क परिमाणकी गोली बना लेवे । प्रतिदिन एक गोली भक्षण करनेसे वातकफजनित रोग नष्ट होते हैं । इसको महावात- गजांकुश रस कहते हैं ॥ १२ ॥ १३ ॥ वातनाशन रस । सूतहाटकवज्राणि ताम्रं लोहञ्च माक्षिकम् । तालं नीलाञ्जनं तुत्थं सिन्धुफेनं समांशिकम्॥१४॥ पञ्चानां लवणानाञ्च भागैकं सुविमर्दयेत् । वज्रीक्षीरैर्दिनैकन्तु रुध्वा तं भूधरे पचेत् ॥ १५ ॥ माषैकमार्द्रकद्रावैर्लिह्याद्वातविनाशनम् । पिप्पलीमूलकक्वाथं सकृष्णमनुपाययेत् ॥ सर्वान्वातविकारांश्च निहन्त्याक्षेपकादिकान् ॥ १६॥