रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 373, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३४७ ) रससिन्दूर, सोनाभस्म, हीराभस्म, तांबाभस्म, लोहाभस्म, सोना- माखीभस्म, हरितालभस्म, रसौत, तूतिया, समुद्रफेन और पांचोंलवण यह सब औषधि समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके मूषामें रखकर भूधरयन्त्रमें पकावे । इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे वातरोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेके अन्तमें पीपलके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर पान करे । इससे आक्षेपकादि समस्त वातरोग नष्ट होते हैं ॥ १४-१६ ॥ वातारि रस । रसभागो भवेदेको द्विगुणो गन्धको मतः । त्रिगुणा त्रिफला ग्राह्या चतुर्भागं तु चित्रकम्॥१७॥ गुग्गुलोः पञ्चभागं चैरण्डतैलेन मर्दयेत् । क्षिप्त्वात्र पूर्वकं चूर्णं पुनस्तेनैव मर्दयेत् ॥ १८ ॥ गुटिकां कर्षमात्रान्तु भक्षयेत्प्रातरुत्थितः । नागरैरण्डमूलानां क्वाथं तदनुपाययेत् ॥ १९ ॥ अङ्ग-मेरण्डतैलेन स्वेदयेत्पृष्ठदेशतः । विरेके तेन सञ्जाते स्निग्धमुष्णञ्च भोजयेत् ॥ वातारिसंज्ञको ह्येष रसो निर्वातसेवितः ॥ २० ॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, त्रिफला ३ भाग, चित्रककी जड़ ४ भाग, गूगल ५ भाग लेवे । प्रथम गूगलको एरण्डीके तेलमें खरल करके पूर्वोक्त पारा आदि औषधियोंको मिलाकर फिर एरण्डीके तेलमें सबको एकत्र घोटे । इसमेंसे प्रतिदिन एक कर्ष परिमाण गोली बना- कर भक्षण करे । ऊपरसे सोंठ और एरण्डीकी जड़का क्वाथ पीवे । पृष्ठसे लेकर सम्पूर्ण शरीरमें एरण्डीके तेलका मर्दन करे । जो एरण्डीतेलके मर्दन करनेसे दस्त होने लगे तो स्निग्ध और उष्ण पदार्थ भक्षण करे । वातरहित स्थानमें रहकर इस औषधिका सेवन करे । इसको वातारि रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥