रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अनिलारि रस । रसेन गन्धं द्विगुणं विमर्द्य वातारिनिर्गुण्डिरसै- र्दिनैकम् । निवेशयेत्ताम्रमये पुटे तत्सर्वं मृदावेष्ट्य च. वालुकाख्ये ॥ २१ ॥ यन्त्रे पुटेद्रोमयचूर्णवह्नौ स्वभावशीते तु समुद्धरेत्तत् । निर्गुण्डिकावात- हराग्नितोयैः संचूर्ण्य यत्नेन विभावयेत्तत् ॥२२॥ रसोऽनिलारिः कथितोऽस्य वल्लमेरण्डतैलेन ससै- न्धवेन । मरीचचूर्णेन ससर्पिषा वा निर्गुण्डि- चित्रैश्च कटुत्रिकैर्वा ॥ २३ ॥ पारा १ भाग और गंधक २ भाग लेवे, दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर एरण्डकी जड़ और सम्हालूके पत्तोंके रसमें एक दिन तक खरल करके तांबेके सम्पुटमें रखकर ऊपरसे कपरोटी करके वालुकायंत्रमें अरने उपलोंकी अग्निसे पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब औषधिको निकालकर चूर्ण कर ले । फिर इस चूर्णको सम्हालूके पत्तेकी जड़ और चित्रककी जड़के रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर एरण्डीके तेल और सेंधा- नमक अथवा काली मिरचोंके चूर्ण और घृत अथवा सम्हालूके पत्तोंके रस और त्रिकुटेके चूर्णके साथ इसका सेवन करे ॥ २१–२३ ॥ वातकंटक रस । वज्रं मृताभ्रहेमार्कतीक्ष्णमुण्डं क्रमोत्तरम् । मरिचे मर्दयेदम्लवर्गेण दिवसत्रयम् ॥ २४ ॥ द्विक्षारं पञ्चलवणं मर्दितं स्यात्समं समम् । ततो निर्गुण्डिकाद्रावैर्मर्दयेद्दिवसत्रयम् ॥ २५ ॥