भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 379

भाषाटीकासहित । ( ३६३ ) धतूरेके बीज १ तोला, जलवेंत ( समुद्र फल ) के बीज १ तोला, गोखुरू १ तोला, विधारेके बीज १ तोला, भांगके बीज १ तोला, जावित्री १ तोला, जायफल १ तोला, कपूर १ तोला और सोनाभस्म आधा तोला लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके पानोंके रसमें खरल करके सीजे हुए चनेकी बराबर गोली बना लेवे । यह औषधि चतुर्मुख रसके समान गुणकारक है । इसको महालक्ष्मी- विलास रस कहते हैं ॥ ४५–४८ ॥ रोगैभसिंह । सूताह्वयो घनवरानलवेल्लभाङ्गी तिक्ताकटुत्रयविषैः सवचैः समांशैः । रोगैभसिंह इति वातकफामयघ्नः सान्द्रोऽयमल्पपटुतो विहितो द्विगुञ्जः ॥ ४९ ॥ रससिन्दूर २ भाग, पारा, नागरमोथा, हरड़, बहेड़ा, आमला, चित्रककी जड़, वायविडंग, भारंगी, कुटकी, सोंठ, पीपल, मरिच, विष और वच यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कफवातज रोग नष्ट होते हैं, इस- लिये इसको रोगैभसिंह कहते हैं ॥ ४९ ॥ श्रीखण्डवटी । एतैर्गुडप्रमृदितै रसवर्जितैः स्यात्, श्रीखण्डनामगुटिका विहिता द्विगुञ्जा । शैत्याद्यजीर्णकफवातभवान् विकारान्, हन्त्यार्द्रकेण नियुताप्यथ केवला वा ॥ ५० ॥ पूर्वोक्त रोगैभसिंह रसमें जो औषधि कही हैं उनमेंसे रससिन्दूरको निकालकर उसके स्थानमें गुड़ डालकर दो २ रत्ती परिमाणकी गोली बना लेवे । अदरखके रसके साथ अथवा अनुपानके विना इस औषधिके सेवन करनेसे शीतता, अजीर्ण और कफवातज रोग नष्ट होते हैं । इसको श्रीखण्डवटी कहते हैं ॥ ५० ॥