भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 584 में से

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पृष्ठ 378

( ३५२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, गंधक, लोहाभस्म, अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और पारेसे चौथाई भाग सोनेकी भस्म लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर घींकारके रसमें खरल करके एरण्डके पत्तोंमें लपेटकर तीन दिनतक धानोंके ढेरमें रख देवे । पश्चात् उसको निकालकर त्रिफ- लेके रसके साथ सर्व रोगोंमें प्रयोग करे । अग्निका बलाबल देखकर इसकी मात्राका निरूपण करे । इसके सेवन करनेसे वली और पलित रोग नष्ट होकर पुष्टि, बल और आयुकी वृद्धि होती है । इसके सेवन करनेसे पुत्ररहित स्त्री पुत्र प्रसव करनेको समर्थ होती है । इससे एका- दश प्रकारके क्षय रोग, पांच प्रकारकी खाँसी, अठारह प्रकारके कुष्ठ, पांडु, प्रमेह, शूल, कास, हिचकी, मंदाग्नि, अम्लपित्त, अपस्मार, उन्माद, अर्श और सब प्रकारके चर्मरोग नष्ट होते हैं । जिस प्रकार वज्रसे वृक्षोंका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे समस्त रोग नष्ट होते हैं । पृथिवीकी रक्षाके लिये यह औषधि स्वयं ब्रह्मदेवने कही है । यह औषधि ब्रह्माके समान है इस कारण इसका नाम चतुर्मुख रस है ॥ ३८-४४ ॥ लक्ष्मीविलास रस । पलं कृष्णाभ्रचूर्णस्य तदर्द्धौ रसगन्धकौ । बला नागबला भीरु विदारीकन्दमेव च ॥ ४५ ॥ कृष्णधूस्तूरनिचुलं गोक्षुरवृद्धदारयोः । बीजं शक्राशनस्यापि जातीकोषफले तथा ॥ ४६ ॥ कर्पूरञ्चैव कर्षांशं श्लक्ष्णचूर्णं पृथक्पृथक् । गृहीत्वा चाष्टमांशेन स्वर्णं पर्णरसेन च ॥ ४७ ॥ वटिकां स्विन्नचणकप्रमाणां कारयेद्भिषक् । रसो लक्ष्मीविलासोऽयं पूर्ववद्गुणकारकः ॥४८॥ कृष्णाभ्रकका चूर्ण १ पल, पारा २ तोले, गंधक २ तोले, खिरैंटी १ तोला, गंगेरन १ तोला, सतावर १ तोला, विदारीकंद १ तोला, काले

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