भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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पृष्ठ 384

( ३५८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दशसारवटी ख्याता सर्ववातविकारनुत् ॥ अथ दाडिममित्यत्र गणमिच्छन्ति चापरे॥७०॥ मुलैठी, आमले, खिरैंटी, दाख, इलायची, लालचंदन, सुगंधवाला, महुवेके फूल, खजूर और अनार यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबकी बराबर मिश्री लेवे । सबको एकत्र मिलाकर प्रतिदिन इसमेंसे दो तोले परिमाण औषधि सेवन करे । और कितनेक वैद्य इसमें दाडिमके स्थानमें दाडिमाद्यगण व्यवहार करते हैं । इसको दशसारवटी कहते हैं ॥ ६९ ॥ ७० ॥ गगनादिवटी । मृतगगनरसार्कं मुण्डतीक्ष्णं सताप्यं सवलि सम- मिदं स्याद्यष्टितोयप्रविष्टम् । तदनु सलिलजातै- र्वासकैर्गोस्तनीभिर्मृदितमनुविदारीवारिणा घस्र- मेकम् ॥ ७१ ॥ घृतमधुसहितेयं वल्लमात्रा वटीति क्षपयति गुरुवातं पित्तरोगं क्षयञ्च । भ्रममदकफ- शोषान् दाहतृष्णासमुत्थान् मलयजमिह पेयं चानुपेयं सचन्द्रम् ॥ ७२ ॥ अभ्रकभस्म, शुद्ध पारा, तांबाभस्म, मुण्डलोहभस्म, तीक्ष्णलोह- भस्म, शुद्ध सोनामाखीभस्म और गंधक यह सब औषधि समान भाग लेकर मुलैठीके क्वाथमें मर्दन करके फिर अडूसे और दाखके क्वाथमें घोटे । पश्चात् विदारीकंदके रसमें एक दिन तक खरल करके २-२ रत्तीकी गोली बना लेवे । घी और सहतके साथ इस औषधिके भक्षण करनेसे अत्यंत दुस्तर वातरोग, पित्तरोग, क्षय, भ्रम, मत्तता, कफज शोथ, दाह और तृषारोग नष्ट होते हैं । इसका सेवन करके ऊपरसे सफेद चंदन और कपूरको भक्षण करे । इसको गगनादिवटी कहते हैं ॥ ७१ ॥ ७२ ॥