भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ३५७ ) विषूचिका, मंदाग्नि, सर्व प्रकारके आमदोष, गुल्म, वमन, संग्रहणी, श्वास, खाँसी, क्रिमि, सर्वांगशूल और मन्यास्तम्भ रोग नष्ट होते हैं । इसको ज्वर, अतिसार, शूल और त्रिदोषज रोगमें यथोचित अनु- पानके साथ सेवन करे । यह वातविध्वंसन रस श्रीमान् महादेवने कहा है ॥ ६०–६६ ॥ पलाशादि वटी । पलाशबीजोत्थरसेन सूतं गन्धेन युक्तं त्रिदिनं विमर्द्य। श्लक्ष्णीकृतं तद्विषतिन्दुबीजं संयोजयेदस्य कलाप्रमाणम् ॥ मासद्वयं निष्कमितं प्रयत्ना- दर्शांसि हन्त्याशु नियोजनीयम् ॥ ६७ ॥ वातरक्तं तथा शोथमस्पर्शाख्यानिलामयम् । वातवत्पित्तरोगेऽपि तत्र पित्तेन भावयेत् ॥ पलाशादिवटी ख्याता वातरोगकुलान्तिका ॥६८॥ पारा और गंधक दोनोंको समान भाग लेकर ढाकके बीजोंके रसमें तीन दिनतक अच्छे प्रकारसे खरल करके फिर उसमें पारे और गंध- कसे सोलहवां भाग कुचिलेका चूर्ण मिला लेवे । इसमेंसे प्रतिदिन चार मासे परिमाण औषधि लेकर प्रातःकाल भक्षण करे । इस प्रकार दो मास पर्यत औषधि सेवन करनेसे बवासीर, वातरक्त, शोथ और स्पर्शज्ञानकी हीनता रोग दूर होते हैं । इस औषधिको पित्तके रोगोंमें प्रयुक्त करे तो पांच पित्तोंके द्वारा भावना देवे । इसको वातनाशक- पलाशादि वटी कहते हैं ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ दशसार वटी । यष्टी धात्री बला द्राक्षा एला चन्दनवालुकम् । मधूकपुष्पं खर्जूरं दाडिमं पेषयेत्समम् ॥ ६९ ॥ सर्वतुल्या सिता योज्या पलार्द्धं भक्षयेत्सदा ।