रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कर प्रातःकाल भक्षण करे और छायामें विश्राम करे । इसके सेवन करनेसे स्पर्शज्ञानकी हीनता दूर होती है । इसको तालकेश्वर रस कहते हैं ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ महाराजेश्वर रस । रसभस्म लौहमभ्रं सिंदूरं स्वर्णभस्मकम् । प्रवालं रजतं कांस्यं तालकं च समं समम् ॥ ७८॥ आर्द्रकस्वरसेनैव त्रिदिनं मर्दयेद्भिषक् । ततश्चतुष्टयं यामं पुटं दद्याद्गजाव्हये ॥ ७९ ॥ ततः समुद्धतं चैतद् वाटचालकरसेन च । मर्दयित्वा वटी कार्या त्रिगुञ्जाफलसन्निभा ॥ ८० ॥ बहुदोषान्वितं वातं रक्तेन सह मूर्च्छितम् । एतान्सर्वान्निहन्त्याशु वातपित्तकफोत्थितान् ॥८१॥ रससिन्दूर, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, स्वर्णसिन्दूर, सोनेकी भस्म, मूंगाभस्म, रूपाभस्म, कांसाभस्म और हरिताल यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसमें तीन दिन तक खरल करके चार प्रहरतक गजपुटमें पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब निकाल कर खिरेंटीके रसमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत दोषयुक्त वातरोग, रक्तवात, वातपित्त और कफज रोग नष्ट होते हैं ॥ ७८-८१ ॥ वातकेशरी रस । शिलायां निगुंडं नागं ताप्यं भस्मार्द्धभागिकम् । पादं पादं क्षिपेद्भस्म शुद्धस्य विमलस्य च ॥८२॥ कान्ताभ्रसत्त्वयोश्चापि स्फटिकस्य पृथक् पृथक् । सर्वमेकत्र सञ्चूर्ण्य पुटेत्त्रिफलवारिणा ॥ ८३ ॥