भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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भाषाटीकासहित । ( ३६१ ) त्रिंशद्वनोपलेनैव त्रिंशद्वारं विचूर्णयेत् । व्योषवल्कलचूर्णैश्च समांशैः सह लेहयेत् ॥ ८४ ॥ मध्वाज्यसहितं हन्ति प्रलीढं वल्लमात्रया । अशीतिवातजान्रोगान्धनुर्वातं विशेषतः ॥ ८५ ॥ कफरोगानशेषांश्च मूत्ररोगांश्च सर्वशः । कासं श्वासं पाण्डुरोगं श्वयथुं सूतिकामयम् ॥ ८६ ॥ ग्रहणीमामदोषं च वह्निमान्द्यं मृदुज्वरम् । सर्वान् रोगांश्च दोषांश्च नाशयेदनुपानतः ॥ ८७ ॥ सीसेकी भस्म १ भाग, सोनामाखी आधा भाग, शुद्ध रूपामाखी, कांतलोह, अभ्रक और स्फटिककी भस्म यह प्रत्येक औषधि सीसेसे चौथाई भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र त्रिफलेके रसमें खरल करके पुटमें पकावे । इसप्रकार तीस बार त्रिफलेके रसमें खरल करके तीस बार पुटके द्वारा पकावे । पश्चात् चूर्ण करके दो रत्ती परिमाण लेकर दो रत्ती परिणाम त्रिकुटे और दालचीनीके चूर्णके साथ सेवन करे । सहत और घृतमें मिलाकर चाटनेसे अस्सी प्रकारके वातरोग, धनुर्वात, बहुत प्रकारके कफज रोग, सर्व प्रकारके मूत्ररोग, खाँसी, श्वास, क्षय, पांडु, शोथ, सूतिका, संग्रहणी, आमदोष, मंदाग्नि और मन्दज्वर नष्ट होते हैं । इसको भिन्न भिन्न अनुपानोंके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग और सर्व प्रकारके दोष दूर होते हैं । इसको वातकेशरी रस कहते हैं ॥ ८२-८७ ॥ त्रैलोक्यचिन्तामणि रस । हीरं सुवर्णं सुमृतञ्च तारमेषां समं तीक्ष्णरजश्चतु- र्णम् । समं मृताभ्रं रससिन्दुरञ्च निष्पिष्टतीक्ष्णस्य तथाश्मनो वा ॥ ८८ ॥ खल्ले द्रवेणैव कुमारिकाया गुञ्जाप्रमाणां वटिकां प्रकुर्यात् । त्रैलोक्यचिन्ता-