रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मणिरेष नाम्ना संपूज्य सम्यग्गिरिजां दिनेशम् ॥ ॥ ८९ ॥ हन्त्यामयान्योगशतैर्विवर्ज्यामयप्रणाशाय मुनिप्रणीतः । अस्य प्रसादेन गदानशेषाञ्जरां विनिर्जित्य सुखं विभाति ॥ ९० ॥ हीराभस्म, सोनाभस्म और चाँदीभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, तीक्ष्ण लोहभस्म ३ भाग, अभ्रकभस्म ६ भाग, और रस- सिन्दूर ६ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके लोह अथवा पत्थरके खरलमें घीक्वारके रसके द्वारा खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । पार्वती और सूर्यदेवकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करना आरम्भ करे । जो रोग सैकड़ों औषधियोंके सेवन करनेसे भी शांत नहीं होते उन समस्त रोगोंको शमन करनेके लिये यह औषधि मुनिजनोंने कही है । इस औषधिके प्रभावसे मनुष्योंके समस्त रोग और वृद्धता नष्ट होकर सुखकी वृद्धि होती है ॥ ८८–९० ॥ स्निग्धे श्लेष्मण्यार्द्रकस्य रसेन पाययेत्सुधीः । शुष्के च माक्षिकेणैव पित्ते घृतसितायुतम् ॥९१॥ श्लेष्मणि मारुते सम्यग्दुष्टे च समतां गते । कणाचूर्णं क्षौद्रयुतं प्रमेहे दुग्धसंयुतम् ॥ ९२ ॥ बलवर्णाग्निजननः कासघ्नः कफवातजित् । आयुःपुष्टिकरो वृष्यः सर्वरोगनिषूदनः ॥ ९३ ॥ इति वातव्याध्यधिकारः । जो कफकी स्निग्धता हो तो अदरखके रसके साथ, कफ शुष्क ( खुश्क ) होय तो सहतके साथ, पित्तयुक्त वातरोगमें घृत और मिश्रीके साथ, कफाश्रित वायुमें और जो वायु अच्छे प्रकारसे दूषित होकर चिकित्सासे शमन नहीं होती ऐसी वायुमें पीपलके चूर्ण और