रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
( ३६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मणिरेष नाम्ना संपूज्य सम्यग्गिरिजां दिनेशम् ॥ ॥ ८९ ॥ हन्त्यामयान्योगशतैर्विवर्ज्यामयप्रणाशाय मुनिप्रणीतः । अस्य प्रसादेन गदानशेषाञ्जरां विनिर्जित्य सुखं विभाति ॥ ९० ॥ हीराभस्म, सोनाभस्म और चाँदीभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, तीक्ष्ण लोहभस्म ३ भाग, अभ्रकभस्म ६ भाग, और रस- सिन्दूर ६ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके लोह अथवा पत्थरके खरलमें घीक्वारके रसके द्वारा खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । पार्वती और सूर्यदेवकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करना आरम्भ करे । जो रोग सैकड़ों औषधियोंके सेवन करनेसे भी शांत नहीं होते उन समस्त रोगोंको शमन करनेके लिये यह औषधि मुनिजनोंने कही है । इस औषधिके प्रभावसे मनुष्योंके समस्त रोग और वृद्धता नष्ट होकर सुखकी वृद्धि होती है ॥ ८८–९० ॥ स्निग्धे श्लेष्मण्यार्द्रकस्य रसेन पाययेत्सुधीः । शुष्के च माक्षिकेणैव पित्ते घृतसितायुतम् ॥९१॥ श्लेष्मणि मारुते सम्यग्दुष्टे च समतां गते । कणाचूर्णं क्षौद्रयुतं प्रमेहे दुग्धसंयुतम् ॥ ९२ ॥ बलवर्णाग्निजननः कासघ्नः कफवातजित् । आयुःपुष्टिकरो वृष्यः सर्वरोगनिषूदनः ॥ ९३ ॥ इति वातव्याध्यधिकारः । जो कफकी स्निग्धता हो तो अदरखके रसके साथ, कफ शुष्क ( खुश्क ) होय तो सहतके साथ, पित्तयुक्त वातरोगमें घृत और मिश्रीके साथ, कफाश्रित वायुमें और जो वायु अच्छे प्रकारसे दूषित होकर चिकित्सासे शमन नहीं होती ऐसी वायुमें पीपलके चूर्ण और
भाषाटीकासहित । ( ३६३ ) सहतके साथ और प्रमेह रोगमें दूधके साथ इस औषधिको भक्षण करे । इस औषधिके सेवन करनेसे बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है। कासरोग, कफरोग और सब प्रकारके वायुरोग नष्ट होते हैं। आयु, पुष्टि और शुक्रकी वृद्धि होती है तथा सब प्रकारके रोग नष्ट होते हैं। इसको त्रैलोक्याचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ ९१-९३ ॥ इति वातव्याधिचिकित्सा । अथ कफरोगाधिकार । श्लेष्मकालानल रस । रसस्य द्विगुणं गन्धं गन्धकाद्विगुणं विषम् । विषात्तु द्विगुणं देयं चूर्णं त्रिकटुसम्भवम् ॥ १ ॥ रसतुल्या प्रदातव्या चाभया सविभीतकी । धात्रीपुष्करमूलञ्च अजमोदाजगन्धिका ॥ २ ॥ विडङ्गं कट्फलं चव्यं पञ्चैव लवणानि च । लवङ्गं त्रिवृता दन्ती सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ॥ ३ ॥ भावयेत्सप्तधा रौद्रे स्वरसैः सुरसोद्भवैः । हन्ति सर्वं कफोद्भूतं व्याधिं कालानलो रसः ॥ ४ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, विष ४ भाग, त्रिकुटेका चूर्ण ८ भाग, हरड़ १ भाग, बहेड़ा १ भाग, आमला १ भाग, कूठ १ भाग, अजवायन १ भाग, अजमोद १ भाग, वायविडंग १ भाग, कायफल १ भाग, चव्य १ भाग, पांचों लवण ५ भाग, लौंग १ भाग, निसोध १ भाग और दंती १ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीस- कर तुलसीके रसमें सात भावना देवे । इसके सेवन करनेसे समस्त कफज रोग नष्ट होते हैं। इसको श्लेष्मकालानल रस कहते हैं ॥१-४॥
( ३६४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । श्लेष्मशैलेन्द्र रस । पारदं गन्धकं लौहं त्र्यूषणं जीरकद्वयम् । शृङ्गी शटी यमानी च पौष्करञ्चार्द्रकन्तथा ॥ ५ ॥ गैरिकं यावशूकञ्च टङ्कणं गजपिप्पली । जातीकोषाजमोदा च वरायासलवंगकम् ॥ ६ ॥ कणकारुणबीजानि कट्फलं चव्यकं तथा । प्रत्येकं तोलकञ्चैषां श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥ ७ ॥ पाषाणे विमले खल्ले घृष्टं पाषाणमुद्गरैः । बिल्वमूलरसं दत्त्वा चार्कचित्रफलत्रिकाः ॥ ८ ॥ निर्गुण्डी गणिका वासा चेन्द्राशनं प्रचोदनी । धुस्तूरं कृष्णजीरञ्च पारिभद्रकपिप्पली ॥ ९ ॥ एतेषाञ्च रसैर्मर्द्यमार्द्रकैश्च विभावयेत् । उष्णतोयानुपानेन सर्वं व्याधिं विनाशयेत् ॥ १० ॥ विंशतिं श्लैष्मिकान्रोगान्सन्निपातभवान्गदान् । उदराष्टकदुर्नाममामवातञ्च दारुणम् ॥ ११ ॥ पञ्च पाण्ड्वामयान्दोषान्कृमिं स्थौल्यमथो नृणाम् । यथा शुष्केन्धने वह्निस्तथैवाग्निविवर्द्धनः ॥ १२ ॥ पारा, गंधक, लोहभस्म, त्रिकुटा, जीरा, काला जीरा, काकड़ा- शिंगी, कचूर, अजवायन, कूठ, सोंठ, गेरू, जवाखार, सुहागा, गज- पीपल, जावित्री, अजमोद, त्रिफला, धमासा, लौंग, धतूरेके बीज, आकके बीज, कायफल और चव्य यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके पत्थ- रके खरलमें डालकर पत्थरकी मूसलीसे पीसे । फिर बेलकी जड़का रस, आककी जड़का रस, चित्रककी जड़का रस, त्रिफलेका रस,
भाषाटीकासहित । ( ३६५ ) सम्हालके पत्तोंका रस, अरणीकी जड़का रस, अडूसेके पत्तोंका रस, भांगके पत्तोंका रस, कटेरीका रस, धतूरेके पत्तोंका रस, काले जीरेका क्वाथ, फरहदका क्वाथ, पीपलका क्वाथ और अदरखका रस इन प्रत्ये- कके रसमें अलग २ मर्दन करके सात सात वार भावना देकर गोली बना लेवे । उष्ण जलके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे बीस प्रका- रके कफके रोग, त्रिदोष व्याधि, आठ प्रकारके उदररोग, बवासीर, आमवात, पांच प्रकारका पांडु रोग, क्रिमि और मेदरोग नष्ट होते हैं । जिस प्रकार सूखे काष्ठमें अग्नि शीघ्र ही प्रविष्ट होकर प्रचण्ड हो जाती है उसी प्रकार इस औषधिसे जठरानल दीप्त होती है । इसको श्लेष्मशैलेन्द्र रस कहते हैं ॥ ५-१२ ॥ महाश्लेष्मकालानल रस । हिंगुलसम्भवं सूतं शिलागन्धकटंकणम् । ताम्रं वङ्गं तथाभ्रञ्च स्वर्णमाक्षिकतालकम् ॥ १३ ॥ धूस्तूरं सैन्धवं कुष्ठं हिंगु पिप्पलिकट्फलम् । दन्तीबीजं सोमराजी वनराजफलत्रिवृत् ॥१४॥ वज्रीक्षीरेण संमर्द्य वटिकां कारयेद्भिषक् । कलायपरिमाणान्तु खादेदेकां यथाबलम् ॥ १५ ॥ सन्निपातं निहन्त्याशु वृक्षमन्द्राशनिर्यथा । मदसिंहो यथारण्ये मृगाणां कुलनाशनः ॥ तथाऽयं सर्वरोगाणां सद्यो नाशकरो महान् ॥ १६ ॥ सिंग्रफसे निकाला हुआ पारा, मैनशिल, गंधक, सुहागा, तांबा- भस्म, वंगभस्म, अभ्रकभस्म, सोनामाखीभस्म, हरिताल, धतूरेके बीज, सेंधानमक, कूठ, हींग, पीपल, कायफल, दंतीके बीज, बाव- चीके बीज, अमलतासकी फली और निसोतकी जड़ इन सब औष- धियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके मटरकी बरा- १३
( ३६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बर गोली बना लेवे । प्रतिदिन एक गोली खानेसे वज्रसे नष्ट हुए वृक्षके समान सन्निपातरोग नष्ट होता है । जिस प्रकार उन्मत्त सिंह वनके बीचमें पशुओंका नाश करता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे रोगोंका समूह नष्ट होता है । इसको महाश्लेष्मकालानल रस कहते हैं ॥ १३-१६ ॥ महालक्ष्मीविलास रस । पलं वज्राभ्रचूर्णस्य तदर्द्धं गन्धकं भवेत् । तदर्द्धं वङ्गभस्मापि तदर्द्धं पारदं तथा ॥ १७ ॥ तत्समं हरितालञ्च तदर्द्धं ताम्रभस्मकम् । रससाम्यञ्च कर्पूरं जातीकोषफले तथा ॥ १८ ॥ वृद्धदारकबीजञ्च बीजं स्वर्णफलस्य च । प्रत्येकं कार्षिकं भागं मृतस्वर्णञ्च शाणकम् ॥ १९॥ निष्पिष्य वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः । निहन्ति सन्निपातोत्थान्गदान्घोरान्सुदारुणान् २०॥ गलोत्थानन्त्रवृद्धिञ्च तथातीसारमेव च । कुष्ठमेकादशविधं प्रमेहान्विंशतिन्तथा ॥ २१ ॥ श्लीपदं कफवातोत्थं चिरजं कुलजन्तथा । नाडीव्रणं व्रणं घोरं गुदामयभगन्दरम् ॥ २२ ॥ कासपीनसयक्ष्मार्शःस्थौल्यदौर्गन्ध्यरक्तनुत् । आमवातं सर्वरूपं जिह्वास्तम्भं गलग्रहम् ॥२३॥ उदरं कर्णनासाक्षिमूखवैजाड्यमेव च । सर्वशूलं शिरःशूलं स्त्रीरोगञ्च विनाशयेत् ॥ २४ ॥ वज्राभ्रकका चूर्ण १ पल, गंधक आधा पल, वंगभस्म १ तोला, पारा ६ मासे, हरिताल ६ मासे, तांबेकी भस्म ३ मासे, कपूर, जाय-
भाषाटीकासहित । ( ३६७ ) फल और जावित्री यह प्रत्येक औषधि छः छः मासे, विधारेके बीज और धतूरेके बीज यह प्रत्येक एक एक तोला और सोनाभस्म ४ मासे लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र मर्दन करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे त्रिदोषज सर्व प्रकारके रोग, गलोत्थ रोग, आन्त्रवृद्धि, अतिसार, ग्यारह प्रकारके महाकुष्ठ, बीस प्रकारके प्रमेह, कफवातज श्लीपद, चिरकालका श्लीपद, वंशज श्लीपद, नाड़ीव्रण, व्रण, भगन्दर, खांसी, पीनस, राजयक्ष्मा, बवासीर, मेदरोग, दुर्गंध, रुधिरजनित रोग, सर्व प्रकारका आमवात, जिह्वास्तम्भ, गलग्रह, उदररोग, कर्ण, नासिका, नेत्र और मुखकी जड़ता, सर्व प्रकारका शूल, शिरःशूल और स्त्रीरोग प्रभृति नष्ट होते हैं ॥ १७–२४॥ वटिकां प्रातरैकैकां खादेन्नित्यं यथाबलम् । अनुपानमिह प्रोक्तं मांसं पिष्टं पयो दधि ॥ २५ ॥ वारिभक्तं सुराशीधुसेवनात्कामरूपधृक् । वृद्धोऽपि तरुणस्पर्द्धी न च शुक्रक्षयो भवेत् ॥ २६॥ न च लिङ्गस्य शैथिल्यं न केशा यान्ति पक्कताम् । नित्यं गच्छेच्छतं स्त्रीणां मत्तवारणविक्रमः ॥ २७॥ द्विलक्षयोजनी दृष्टिर्जायते पौष्टिकस्तथा । प्रोक्तः प्रयोगराजोऽयं नारदेन महात्मना ॥ २८ ॥ रसो लक्ष्मीविलासोऽयं वासुदेवो जगत्पतिः । प्रसादादस्य भगवान् लक्षनारीषु वल्लभः ॥ २९ ॥ प्रतिदिन प्रातःकाल नित्य इसकी एक गोली खाय और इसपर मांस, मिष्टान्न ( पक्वान्न ) दूध, दही, जलयुक्त भात अथवा मांडयुक्त भात और मदिरा सेवन करे तो कामदेवके समन स्वरूपवान् हो
( ३६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जाता है तथा वृद्ध मनुष्य भी युवाके समान स्पर्द्धायुक्त होता है । कदापि शुक्रक्षय नहीं होता, लिंगमें शिथिलता नहीं उत्पन्न होती, बाल सुफेद् नहीं होते, उन्मत्त हाथीके समान प्रतिदिन सैकड़ों स्त्रियोंसे रमण करनेको समर्थ होता है, दो लक्ष योजन तक देखनेको समर्थ हो जाता है और शरीरमें पुष्टिकी वृद्धि होती है । जगत्पति श्रीकृष्ण भगवान् इसी औषधिका सेवन करके लक्ष स्त्रियोंके साथ विषय करनेको समर्थ हुए थे । इस उत्तम औषधिको महात्मा नारदजीने कहा है । इसको महालक्ष्मीविलास रस कहते हैं ॥ २५-२९ ॥ कफकेतु रस । टङ्कणं मागधी शङ्खं वत्सनाभं समं समम् । आर्द्रकस्य रसेनापि भावयेद्दिवसत्रयम् ॥ ३० ॥ गुञ्जामात्रं प्रदातव्यमार्द्रकस्य रसेन वै । पीनसं श्वासकासं च गलरोगं गलग्रहम् ॥ ३१ ॥ दन्तरोगं कर्णरोगं नेत्ररोगं सुदारुणम् । सन्निपातं निहन्त्याशु कफकेतुरसोत्तमः ॥ ३२ ॥ सुहागा, पीपल, शंखकी भस्म और विष यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसमें तीन भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । अदरखके रसके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे पीनस, श्वास, खाँसी, गलरोग, गलेकी पीड़ा, दन्तरोग, कर्णरोग, नेत्ररोग और सन्निपात रोग नष्ट होते हैं । इसको कफकेतु रस कहते हैं ॥ ३०-३२ ॥ कफचिन्तामणि रस । हिंगुलेन्द्रयवं टङ्कं त्रैलोक्यबीजमेव च । मरिचञ्च समं सर्वं त्रिभागं रससिन्दुरम् ॥ ३३ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३६९ ) आर्द्रकस्य रसेनैव मर्दयेद्याममात्रकम् । चणकाभा वटी कार्या सर्ववातप्रशान्तये ॥ कफरोगं निहंत्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३४ ॥ इति कफरोगाधिकारः । सिंग्रफ, इन्द्रजौ, सुहागा, भांगके बीज और काली मिरच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, रससिन्दूर ३ भाग इन सबको एकत्र खरल कर फिर अदरखके रसमें एक प्रहरपर्यन्त खरल करके चनेकी बराबर गोली बना सेवन करनेसे सर्व प्रकारके वातरोग और कफरोग ऐसे नष्ट होते हैं जिस प्रकार सूर्योदयसे अन्धकारका समूह नष्ट होता है । इसे कफचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ ३३॥ ३४ ॥ इति कफरोगाधिकार सम्पूर्ण । अथ पित्तरोगचिकित्सा । गुडूच्यादिलोह । गुडूचीसारसंयुक्तं त्रिकत्रययुतन्त्वयः । वातरक्तं निहन्त्याशु सर्ववातहरं परम् ॥ १ ॥ गिलोयका सत्त, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोहेकी भस्म १० भाग लेवे । इन सब औषधि- योंको एकत्र खरल करके यथामात्राकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे वातरक्त और सर्व प्रकारके वातरोग नष्ट होते हैं । इसको गुडूच्यादि लोह कहते हैं ॥ १ ॥ धात्रीलोह । धात्रीचूर्णस्याष्टौ पलानि चत्वारि लौहचूर्णस्य । यष्टीमधुकरजश्च द्विपलं दद्यात्पुटे घृष्टम् ॥ २ ॥
( ३७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । धात्र्याश्च क्वाथेन तच्चूर्णं भाव्यञ्च सप्ताहम् । चण्डातपेन संशुष्कं भूयः पिष्टं घटे स्थितम् ॥ ३ ॥ घृतेन मधुना युक्तं भोजनाद्यन्तमध्यतः । त्रीन्वारान्भक्षयेन्नित्यं पथ्यं दोषानुबन्धतः ॥ ४ ॥ भुक्तस्यादौ नाशयेच्च दोषान्पित्तकृतानपि । मध्ये चानाहविष्टब्धं तथान्ते चाग्निमान्द्यताम् । रक्तपित्तसमुद्भूतान् रोगान् हन्ति न संशयः ॥ ५ ॥ आमलौंका चूर्ण ८ पल, लोहेकी भस्म ४ पल और मुलैठीका चूर्ण
- २ पल इन सब औषधियोंको एकत्र करके आमलोंके क्वाथमें सात भावना देकर प्रचण्ड सूर्यकी धूपमें सुखाकर फिर मर्दन करे । पश्चात् इस औषधिको घृत और सहतके साथ भोजनकी आदि, अंत और मध्य अवस्थामें तीन वार सेवन करावे । इस औषधिके सेवनके अन्तमें यथादोषानुसार पथ्य देवे । भोजनकी आदिमें इस औषधिके सेवन करनेसे समस्त पित्तज रोग नष्ट होते हैं, भोजनकी मध्य अवस्थामें इस औषधिके सेवन करनेसे आनाह और विष्टब्धाजीर्ण शमन होते हैं, भोजनके अन्तमें सेवन करनेसे मन्दाग्नि और समस्त रक्तपित्तोत्पन्न रोग दूर होते हैं । इसको धात्रीलोह कहते हैं ॥ २-५ ॥ पित्तान्तक रस । जातीकोषफले मांसी कुष्ठं तालीशपत्रकम् । माक्षिकं मृतलौहञ्च अभ्रं दिव्यं समांशकम् ॥ ६ ॥ सर्वतुल्यं मृतं तारं समं निष्पिष्य वारिणा । द्विगुञ्जाभा वटी कार्या पित्तरोगविनाशिनी ॥ ७ ॥ कोष्ठाश्रितञ्च यत्पित्तं शाखाश्रितमथापि वा । शूलञ्चैवाम्लपित्तञ्च पाण्डुरोगं हलीमकम् ॥ ८ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३७१ ) दुर्नामभ्रान्तिवान्तिञ्च क्षिप्रमेव विनाशयेत् । रसः पित्तान्तको ह्येष काशिराजेन भाषितः ॥ ९ ॥ जावित्री, जायफल, वालछड़, कूट, तालीशपत्र, सोनामाखी, लोह- भस्म, अभ्रकभस्म, लौंग यह सब औषधि समान भाग और चाँदी- भस्म सबके बराबर लेकर जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके पित्तरोग, कोष्ठाश्रित पित्त, शाखाश्रित पित्त, शूल, अम्लपित्त, पाण्डुरोग, हलीमक, बवासीर, भ्रम और वमन शांत होते हैं । इसको काशिराज दिवोदासने कहा है॥६-९॥ महापित्तान्तक रस । यदात्र माक्षिकं त्यक्त्वा सुवर्णमपि दीयते । महापित्तान्तको नाम सर्वपित्तविनाशनः ॥ १० ॥ इति पित्तरोगचिकित्सा । पित्तान्तक रसमें जो औषधि कही हैं उनमेंसे सोनामाखीको निकाल- कर उसके स्थानमें सोनेकी भस्म डाले तो इसको महापित्तान्तक रस कहते हैं । इससे सर्व प्रकारके पित्तरोग नष्ट होते हैं ॥ १० ॥ इति पित्तरोगधिकार सम्पूर्ण । अथ वातरक्तरोगचिकित्सा । लाङ्गल्याद्य लोह । विशुद्धलाङ्गलीमूलत्रिकटुत्रिफलैस्तथा । द्राक्षागुग्गुलुभिस्तुल्यं लौहचूर्णं नियोजयेत् ॥ १ ॥ मातुलुङ्गरसेनैव त्रिफलाया रसेन च । विमृद्य यत्नतः पश्चाद्गुटिकां कोलसम्मिताम् । भक्षयेन्मधुना सार्द्धं शृणु कुर्वन्ति यान्गुणान् ॥ २ ॥
( ३७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आजानुस्फुटितं घोरं सर्वाङ्ग-स्फुटितं तथा । तत्सर्वं नाशयेत्याशु साध्यासाध्यञ्च शोणितम् ॥३॥ कलिहारीकी जड़, त्रिकुटा, त्रिफला, दाख और गूगल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, लोहाभस्म ९ नव भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर बिजोरे नींबूके रसमें और त्रिफलेके रसमें खरल करके एक एक तोलेकी गोली बना लेवे । सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे जानुपर्यंत स्फुटित वातरक्त, सर्वांग स्फुटित वातरक्त और साध्यासाध्य वातरक्त नष्ट होता है । इसको लाङ्ग- ल्याद्य लोह कहते हैं ॥ १-३ ॥ वातरक्तान्तक रस । गन्धकं पारदं लौहं शिलां तालं घनं तथा । शिलाजतु पुरं शुद्धं समभागं विचूर्णयेत् ॥ ४ ॥ श्वेतापराजिता दार्वी वागुची चित्रकं तथा । पुनर्नवा देवकाष्ठत्रिफलाव्योषवेल्लकम् ॥ ५ ॥ चूर्णमेषां पृथक् तुल्यं सर्वमेकत्र कारयेत् । त्रिफलाभृंगराजस्य रसेनैव त्रिधा त्रिधा ॥ ६ ॥ भावयेद्भक्षयेत्पश्चाच्चणमात्रं दिने दिने । ततोनुपात्रं निम्बस्य पत्रं पुष्पं त्वचं समम् ॥ ७ ॥ शाणमानं घृतैः कुर्यात्सर्ववातविकारनुत् । वातरक्तं महाघोरं गम्भीरं सर्वजं च यत् ॥ सर्वोपद्रवसंयुक्तं साध्यासाध्यं निहन्त्यलम् ॥ ८ ॥ गंधक, पारा, लोहभस्म, मैनशिल, हरिताल, नागरमोथा, शिला- जीत, गूगल, सफेद कोइलकी जड़, दारुहलदी, बावची, चीतेकी जड़, पुनर्नवा, देवदारु, त्रिफला, त्रिकुटा और वायविडंग इन सब औषधियोंको
भाषाटीकासहित । ( ३७३ ) समान भाग लेकर त्रिफलेके रसमें तीन और भांगरेके रसमें तीन भावना देवे, पश्चात् चनेकी बराबर प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करावे । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें नीमके पत्ते, नीमके फूल और नीमकी छालका चूर्ण बनाकर घृतके द्वारा सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके वातरोग, घोरतर गम्भीर त्रिदोषज, सर्व उपद्रव संयुक्त और साध्यासाध्य वातरक्त नष्ट होता है। इसको वातरक्तान्तक रस कहते हैं ॥ ४-८ ॥ तालभस्म । हरितालं पलं शुद्धं तथा कर्षं विषस्य च । श्वेताङ्कोठरसेनैव द्वयमेकत्र खल्लयेत् ॥ ९ ॥ पलाशभस्म द्विपलं निधाय स्थालिकोपरि । तद्भस्मोपरि तालस्य गोलकं स्थापयेत्सुधीः॥ १० ॥ तस्योपरि अपामार्गभस्म दद्यात्पलत्रयम् । स्थालीमुखे शरावञ्च दद्याद्यत्नेन लेपयेत् ॥ ११ ॥ लेपयित्वा ततश्चुल्यामहोरात्रं पचेद्भिषक् । ततस्तु जायते भस्म शुद्धकर्पूरसन्निभम् ॥ १२ ॥ गुञ्जात्रयं ततो भक्ष्यमनुपानविशेषतः । वातरक्तञ्च कुष्ठञ्च दद्रुविस्फोटकापचीम् ॥ १३ ॥ विचर्चिकां चर्मदलं वातरक्तञ्च शोणितम् । रक्तपित्तं तथा शोथं गलत्कुष्ठं विनाशयेत् ॥ हलीमकं तथा शूलमग्निमान्द्यमरोचकम् ॥ १४ ॥ शुद्ध हरिताल १ पल और विष १ कर्ष परिमाण लेवे । दोनोंको एकत्र सफेद अंकोलकी जड़के रसमें खरल करके पिंडसा बना लेवे । फिर एक हांडीमें दो पल परिमाण ढाकका खार बिछाकर
( ३७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । उसपर इस हरितालके गोलेको रख देवे और उसके ऊपर तीन पल परिमाण चिरचिटेका क्षार डालकर ऊपरसे एक सिकोरेसे हांडीके मुखको बंद करके मिट्टीसे उसके जोड़ोंको बंद कर देवे । फिर इस हांडीको चूल्हेपर रखकर एक दिन रात बराबर अग्नि देवे । जब शीतल होजाय तब इसमेंसे कर्पूरकी समान हरितालकी भस्मको लेकर तीन रत्ती परिमाण यथोक्त अनुपानके साथ सेवन करनेसे वातरक्त, कुष्ठ, दद्रु, विस्फोटक, अपची, विचर्चिका, चर्म्मदल, रक्तपित्त, शोथ, गलत्कुष्ठ, हलीमक,शूल, मंदाग्नि और अरुचिरोग नष्ट होते हैं । इसको तालभस्म कहते हैं ॥ ९-१४ ॥ महातालेश्वर रस । तथा सिद्धेन तालेन गन्धतुल्येन मेलयेत् । द्वयोस्तुल्यं जीर्णताम्रं वालुकायन्त्रगं पचेत् ॥ १५ ॥ अयं तालेश्वरो नाम रसः परमदुर्लभः । हन्यात्कुष्ठानि सर्वाणि वातरक्तमथापि च ॥ शूलमष्टविधं श्वित्रं रसस्तालेश्वरो महान् ॥ १६ ॥ पूर्वोक्त हरितालकी भस्म और गंधक दोनोंको समान भाग लेवे और दोनोंकी बराबर जारित तांबा मिलाकर वालुकायंत्रमें पकावे । इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके कुष्ठ, वातरक्त, आठ प्रका- रका शूल और श्वित्र रोग नष्ट होते हैं । इसको महातालेश्वर रस कहते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ विश्वेश्वर रस । रसादश विषात्पञ्च गन्धकाद्दश शोधितात् । तुत्थाद्दश पलाशस्य बीजेभ्यः पञ्च कारयेत् ॥ १७॥ क्षुद्राश्वमारधूस्तूर-करहाटकनीलितः । दशकं दशकं कुर्याच्छोषयित्वा जटात्वचः ॥ १८ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३७५ ) दशकं दशकं दत्त्वा कुचिलाच्च नूतनात् । भल्लातकाच्च दशकं चूर्णयित्वा भिषक् ततः ॥ १९ ॥ सुदिने च बलिं दत्त्वा वैद्यः पूजापरायणः । रक्तिकाद्वितयं दद्यात्सहते यदि वा त्रयम् ॥ २० ॥ वातरक्तं ज्वरं कुष्ठं खरस्पर्शमसौख्यदम् । आजानुस्फुटितं हन्ति विषजं वाऽस्थिनिःसृतम्॥२१॥ कुष्ठमष्टादशविधमग्निमान्द्यमरोचकम् । विश्वेश्वरो रसो नाम विश्वनाथेन भाषितः ॥ २२ ॥ पारा १० भाग, विष ५ भाग, गन्धक १० भाग, तूतिया १० भाग, ढाकके बीज ५ भाग, कटेरी १० भाग, कनेर १० भाग, धतूरा १० भाग, कमलकी जड १० भाग और नील वृक्ष दश भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर कटेरी, कनेर, धतूरा, कमल और नील- वृक्ष इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग दश दश भावना देकर पश्चात् कुचिलेके क्वाथमें दश भावना देवे। फिर भिलावेके क्वाथमें दश भावना देवे । पश्चात् चूर्ण करके एक उत्तम बासनमें भरकर रख देवे । अन- न्तर शुभ दिनमें देवताका पूजन करके दो रत्ती परिमाण अथवा बला- नुसार तीन रत्ती परिमाण औषधि सेवन करावे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातरक्त, ज्वर, कुष्ठ, दुःखको देनेवाला खरस्पर्श, जानुपर्य्यन्त स्फुटित वातरक्त, विषज रोग, अस्थिगत रोग, अठारह प्रकारके कुष्ठ, मंदाग्नि और अरुचि रोग नष्ट होते हैं । इस विश्वेश्वररसको महादेवने कहा है ॥ १७–२२ ॥ वक्ष्यते कुष्ठरोगे यदौषधं भिषजां वरैः । वातरक्ते प्रयुञ्जीत कुर्याच्च रक्तमोक्षणम् ॥ २३ ॥ इति श्रीरसेन्द्रसारसंग्रहे वातरक्ताधिकारः ।
(३७६) रसेन्द्रसारसंग्रह । कुष्ठ रोगमें जो औषधि कही हैं वह सब औषधि इस वातरक्त रोगमें भी प्रयुक्त करनी चाहिये तथा इस रोगमें रोगीके शरीरमेंसे रुधिर निकलवाना चाहिये ॥ २३ ॥ इति वातरक्ताधिकार संपूर्ण । अथ ऊरुस्तम्भरोगचिकित्सा । गुञ्जाभद्र रस । निष्कत्रयं शुद्धसूतं निष्कद्वादश गन्धकम् । गुञ्जाबीजञ्च षड्निष्कं जयन्तीनिम्बबीजकम् ॥ १ ॥ प्रत्येकं निष्कमात्रन्तु निष्कं जैपालबीजकम् । जयाजम्बीरधूस्तूरकाकमाचीद्रवैर्दिनम् ॥ २ ॥ भावयित्वा वटीं कुर्याच्चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः । गुञ्जाभद्ररसो नाम हिंगुसैन्धवसंयुतः ॥ शमयत्युल्बणं दुःखमूरुस्तम्भं सुदारुणम् ॥ ३ ॥ पारा ३ निष्क, गंधक १२ निष्क, सफेद घुंघुचीके बीज ६ निष्क, जयंतीके बीज, नीमके बीज और जमालगोटे यह प्रत्येक औषधि एक एक निष्क (चार मासे) लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर भांग, जम्भीरी नींबू, धतूरेके पत्ते और मकोय इन प्रत्येकके रसमें एक एक भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको हींग और सेंधानमकके साथ सेवन करे तो दारुण ऊरुस्तम्भ रोग दूर होता है । इसको गुञ्जाभद्र रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ शिलाजतु गुग्गुलु वा पिप्पलीमथ नागरम् । ऊरुस्तम्भे पिबेन्मूत्रैर्दशमूलीरसेन वा ॥ ४ ॥ प्लीहाधिकारे कथितं रसेन्द्रवारिशोषणम् । ऊरुस्तम्भे प्रयुञ्जीत चान्यद्वा योगवाहिकम् ॥ ५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे ऊरुस्तम्भाधिकारः ।
भाषाटीकासहित । ( ३७७ ) अन्य योग-शिलाजीत और गूगल अथवा पीपल और सोंठके चूर्ण- को गोमूत्रके साथ अथवा दशमूलके काथके साथ सेवन करनेसे ऊरु- स्तम्भ रोग नष्ट होता है । प्लीहाधिकारोक्त वारिशोषण रस अथवा अन्यान्य योगवाही रस भी इसमें प्रयुक्त करने चाहिये ॥ ४ ॥ ५ ॥ इति ऊरुस्तम्भचिकित्सा । अथ आमवाताधिकार । आमवातारी वटिका । रसगन्धकलौहाभ्रं तुत्थं टङ्कणसैन्धवम् । समभागं विचूर्ण्याथ चूर्णाद्विगुणगुग्गुलुः ॥ १ ॥ गुग्गुलोः पादिकं देयं त्रिवृतामूलवल्कलम् । तत्समं चित्रकं देयं घृतेन परिमर्द्दयेत् ॥ २ ॥ खादेन्माषद्वयञ्चास्य त्रिफलाचूर्णयोगतः । आमवातारिवटिका पाचिका भेदिका मता ॥ ३ ॥ आमवातं निहन्त्याशु गुल्मशूलोदराणि च । [L16
( ३७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । परिमाण औषधियोंको एकत्र त्रिफलेके चूर्णके साथ सेवन करे । यह औषधि पाचक, भेदक तथा आमवात, गुल्म, शूल, उदर, यकृत, प्लीहोदर, अष्ठीला, कामला, पांडु, अरुचि, ग्रन्थिशूल, शिरःशूल, वातरोग, गृध्रसी, गलगण्ड, गण्डमाला, क्रिमि, कुष्ठ, भगन्दर, विद्रधि, अन्त्रवृद्धि, बवासीर और समस्त गुदाके रोगोंको नष्ट करती है। इसको आमवातारी वटिका कहते हैं ॥ १-६ ॥ अपर आमवातारी वटिका । रसगन्धौ वरा वह्निर्गुग्गुलुः क्रमवर्द्धितः । एतदेरण्डतैलेन मर्दयेदतिचिक्कणम् ॥ ७ ॥ कर्षोऽस्यैरण्डतैलेन हन्त्युष्णजलपायिनः । आमवातमतीवोग्रं दुग्धं मौद्गादि वर्जयेत् ॥ ८ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, त्रिफला प्रत्येक तीन भाग, चीतेकी जड़ ४ भाग और गूगल ५ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एरण्डके तेलमें खरल करके १तोला परिमाण औषधि अण्डीके तेलके साथ सेवन करे और ऊपरसे गरम जलका अनुपान करे तो अत्यन्त उग्र आमवात रोग नष्ट होता है । इस औषधिपर दूध और मूंग आदि भक्षण करना त्याग देवे, इसको आमवातारी वटिका कहते हैं ॥७॥८॥ आमवातेश्वर रस । शुद्धगन्धं पलार्द्धञ्च मृतताम्रञ्च तत्समम् । ताम्रार्द्धं पारदं शुद्धं रसतुल्यं मृतायसम् ॥ ९ ॥ सर्वं पञ्चांगुलेनैव भावयेच्च पुनः पुनः । संचूर्ण्य पञ्चकोलोत्थैः क्वाथैः सर्वं विभावयेत् ॥१०॥ रौद्रे विंशतिवारांश्च गुडूचीनां रसैर्दश । भृष्टटङ्गणचूर्णेन तुल्येन सह मेलयेत् ॥ ११ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३७९ ) टङ्कणार्द्धं विडं देयं मरिचं विडतुल्यकम् । तिन्तिडी क्षारतुल्यञ्च सूततुल्यञ्च दंतिकम् ॥ १२॥ त्रिकटुतित्रिफलश्चैव लवङ्गश्चार्द्धभागिकम् । आमवातेश्वरो नाम विष्णुना परिकीर्त्तितः ॥ १३ ॥ महाग्निकारको ह्येष आमवातान्तको मतः । स्थूलानां कर्षणः श्रेष्ठः कृशानां स्थौल्यकारकः १४ अनुपानविशेषेण सर्वरोगविनाशनः । अनेन सदृशो नास्ति वह्निदीप्तिकरो महान् ॥ गुल्मार्शोग्रहणीदोषशोथपाण्डुरुजापहः ॥ १५ ॥ शुद्ध गंधक २ तोले, तांबाभस्म २ तोले, पारा १ तोला, लोहभस्म १ तोला इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एरंडकी जड़के रसमें सात वार भावना देकर पश्चात् पंचकोलके क्वाथमें बीस वार भावना देवे और गिलोयके रसमें दश वार भावना देवे । पश्चात् इसमें सुहागा ६ तोला, विडनमक ३ तोला, काली मिरच ३ तोला, इमलीका खार ३ तोला, दंतीके बीज १ तोला तथा सोंठ, पीपल, काली मिरच, हरड़, बहेड़ा, आमला और लौंग यह प्रत्येक औषधि छः छः मासे लेकर अच्छे प्रकारसे खरल कर यह औषधि सेवन करनेसे अत्यन्त अग्निको दीप्त करनेवाली, आमवातनाशक, स्थूल मनुष्योंको कृश करने- वाली, कृश मनुष्योंको स्थूल करनेवाली और अनुपान विशेषसे सर्व- रोगनाशक है। इसकी समान अग्निको दीप्त करनेवाली अन्य औषधि नहीं है । इससे गुल्म, बवासीर, संग्रहणी, शोथ और पांडुरोग नष्ट होते हैं । इस आमवातेश्वर रसको स्वयं विष्णु भगवान्ने कहा है ॥ ९-१५ ॥ वृद्धदाराद्य लोह । वृद्धदारत्रिवृद्दन्तीगजपिप्पलिमानकैः । त्रिकत्रयसमायुक्तैरामवातान्तकन्त्वयः ॥ सर्वानैव गदान् हन्ति केशरी करिणो यथा ॥१६॥
( ३६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विधारेके बीज, निसोधकी जड़, दंतीकी जड़, गजपीपल, मानकंद, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रक, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहभस्म १४ भाग लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ १६ ॥ शिवागुग्गुलु । शिवाविभीतामलकीफलानां प्रत्येकशो मुष्टि- चतुष्टयञ्च । तोयाढके तत्कथितं विधाय पादाव- शेषे त्ववतारणीयम् ॥ १७॥ एरण्डतैलं द्विपलं निधाय पिचुत्रयं गन्धकनामकस्य। पचेत्पुरस्यात्र पलद्वयञ्च पाकावशेषे च विचूर्ण्य दद्यात् ॥१८॥ रास्ना विडंगं मरिचं कणा च दन्ती जटा नागर- देवदारु । प्रत्येकशः कोलमितं तथैषां विचूर्ण्य निःक्षिप्य नियोजयेच्च ॥ १९ ॥ आमवाते कटी- शूले गृध्रसीक्रोष्टुशीर्षके । न चान्यदस्ति भेषज्यं यथाऽयं गुग्गुलुः स्मृतः ॥ २० ॥ हरड़ १६ तोले, बहेड़ा १६ तोले, आमले १६ तोले परिमाण लेकर ८ सेर जलमें पकावे, जब पकते पकते जल चौथाई भाग बाकी रह जाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इस क्वाथमें दो पल एरंडीका तेल, गंधक ३ तोले और गूगल २ पल डालकर मंद मंद अग्निसे पकावे । जब पाक समाप्त हो जाय तब इसमें रास्नाका चूर्ण, वायविडं- गका चूर्ण, काली मिरचोंका चूर्ण, पीपलका चूर्ण, दंतिमूल, सोंठका चूर्ण और देवदारुका चूर्ण प्रत्येक एक एक तोला डालकर उतार लेवे । आमवात, कटीशूल, गृध्रसी और क्रोष्टुशीर्षक प्रभृति रोगोंका नाशक इसके समान अन्य औषधि नहीं है ॥ १७-२० ॥
भाषाटीकासहित । ( ३८१ ) आमवातगजसिंह मोदक । शुण्ठीचूर्णस्य प्रस्थैकं यमान्याश्च पलाष्टकम् । जीरकस्य पले द्वे च धन्याकञ्च पलद्वयम् ॥ २१ ॥ पलैकं शतपुष्पाया लवङ्गस्य पलं तथा । टङ्गणस्य पलं भृष्टं मरिचस्य पलत्रयम् ॥ २२ ॥ त्रिवृतात्रिफलाक्षारपिप्पलीनां पलं तथा । शट्चेला तेजपत्रञ्च चविकानां पलन्तथा ॥ २३ ॥ अभ्रं लौहं तथा वंगं प्रत्येकञ्च पलं पलम् । एतेषां सर्वचूर्णानां खण्डं दद्याद्गुणत्रयम् ॥ २४ ॥ घृतेन मधुना मिश्रं कर्षमात्रन्तु मोदकम् । एकैकं भक्षयेत्प्रातर्घृतञ्चानुपिबेत्पयः ॥ २५ ॥ शूलघ्नो रक्तपित्तघ्नश्चाम्लपित्तविनाशनः । आमवातकुलध्वंसी केशरी विधिनिर्मितः ॥ २६ ॥ सोंठका चूर्ण १ प्रस्थ, अजवायनका चूर्ण आठ पल, जीरेका चूर्ण २ पल, धनियेका चूर्ण २ पल, सौंफका चूर्ण १ पल, लौंगका चूर्ण १ पल, सुहागा १ पल, काली मिरचोंका चूर्ण ३ पल, निसोथका चूर्ण १ पल, हरड़का चूर्ण १ पल, बहेड़ेका चूर्ण १ पल, आमलेका चूर्ण १ पल, जवाखार १ पल, पीपलका चूर्ण १ पल, कचूर १ पल, इलायचीका चूर्ण १ पल, तेजपातका चूर्ण १ पल, चव्यक चूर्ण १ पल, अभ्रकभस्म १ पल, लोहाभस्म १ पल और वंगभस्म १ पल लेवे और सब औषधिसे तिगुनी स्वच्छ खांड लेवे, सब औष- धियोंको एकत्र पीसकर घृत और सहत मिलाकर एक एक कर्षके मोदक बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल इस एक मोदकको भक्षण करे और ऊपरसे घृत और दूधका अनुपान करे । इन मोदकोंके