भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ३७५ ) दशकं दशकं दत्त्वा कुचिलाच्च नूतनात् । भल्लातकाच्च दशकं चूर्णयित्वा भिषक् ततः ॥ १९ ॥ सुदिने च बलिं दत्त्वा वैद्यः पूजापरायणः । रक्तिकाद्वितयं दद्यात्सहते यदि वा त्रयम् ॥ २० ॥ वातरक्तं ज्वरं कुष्ठं खरस्पर्शमसौख्यदम् । आजानुस्फुटितं हन्ति विषजं वाऽस्थिनिःसृतम्॥२१॥ कुष्ठमष्टादशविधमग्निमान्द्यमरोचकम् । विश्वेश्वरो रसो नाम विश्वनाथेन भाषितः ॥ २२ ॥ पारा १० भाग, विष ५ भाग, गन्धक १० भाग, तूतिया १० भाग, ढाकके बीज ५ भाग, कटेरी १० भाग, कनेर १० भाग, धतूरा १० भाग, कमलकी जड १० भाग और नील वृक्ष दश भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर कटेरी, कनेर, धतूरा, कमल और नील- वृक्ष इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग दश दश भावना देकर पश्चात् कुचिलेके क्वाथमें दश भावना देवे। फिर भिलावेके क्वाथमें दश भावना देवे । पश्चात् चूर्ण करके एक उत्तम बासनमें भरकर रख देवे । अन- न्तर शुभ दिनमें देवताका पूजन करके दो रत्ती परिमाण अथवा बला- नुसार तीन रत्ती परिमाण औषधि सेवन करावे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातरक्त, ज्वर, कुष्ठ, दुःखको देनेवाला खरस्पर्श, जानुपर्य्यन्त स्फुटित वातरक्त, विषज रोग, अस्थिगत रोग, अठारह प्रकारके कुष्ठ, मंदाग्नि और अरुचि रोग नष्ट होते हैं । इस विश्वेश्वररसको महादेवने कहा है ॥ १७–२२ ॥ वक्ष्यते कुष्ठरोगे यदौषधं भिषजां वरैः । वातरक्ते प्रयुञ्जीत कुर्याच्च रक्तमोक्षणम् ॥ २३ ॥ इति श्रीरसेन्द्रसारसंग्रहे वातरक्ताधिकारः ।