भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ३७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । उसपर इस हरितालके गोलेको रख देवे और उसके ऊपर तीन पल परिमाण चिरचिटेका क्षार डालकर ऊपरसे एक सिकोरेसे हांडीके मुखको बंद करके मिट्टीसे उसके जोड़ोंको बंद कर देवे । फिर इस हांडीको चूल्हेपर रखकर एक दिन रात बराबर अग्नि देवे । जब शीतल होजाय तब इसमेंसे कर्पूरकी समान हरितालकी भस्मको लेकर तीन रत्ती परिमाण यथोक्त अनुपानके साथ सेवन करनेसे वातरक्त, कुष्ठ, दद्रु, विस्फोटक, अपची, विचर्चिका, चर्म्मदल, रक्तपित्त, शोथ, गलत्कुष्ठ, हलीमक,शूल, मंदाग्नि और अरुचिरोग नष्ट होते हैं । इसको तालभस्म कहते हैं ॥ ९-१४ ॥ महातालेश्वर रस । तथा सिद्धेन तालेन गन्धतुल्येन मेलयेत् । द्वयोस्तुल्यं जीर्णताम्रं वालुकायन्त्रगं पचेत् ॥ १५ ॥ अयं तालेश्वरो नाम रसः परमदुर्लभः । हन्यात्कुष्ठानि सर्वाणि वातरक्तमथापि च ॥ शूलमष्टविधं श्वित्रं रसस्तालेश्वरो महान् ॥ १६ ॥ पूर्वोक्त हरितालकी भस्म और गंधक दोनोंको समान भाग लेवे और दोनोंकी बराबर जारित तांबा मिलाकर वालुकायंत्रमें पकावे । इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके कुष्ठ, वातरक्त, आठ प्रका- रका शूल और श्वित्र रोग नष्ट होते हैं । इसको महातालेश्वर रस कहते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ विश्वेश्वर रस । रसादश विषात्पञ्च गन्धकाद्दश शोधितात् । तुत्थाद्दश पलाशस्य बीजेभ्यः पञ्च कारयेत् ॥ १७॥ क्षुद्राश्वमारधूस्तूर-करहाटकनीलितः । दशकं दशकं कुर्याच्छोषयित्वा जटात्वचः ॥ १८ ॥