रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३७३ ) समान भाग लेकर त्रिफलेके रसमें तीन और भांगरेके रसमें तीन भावना देवे, पश्चात् चनेकी बराबर प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करावे । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें नीमके पत्ते, नीमके फूल और नीमकी छालका चूर्ण बनाकर घृतके द्वारा सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके वातरोग, घोरतर गम्भीर त्रिदोषज, सर्व उपद्रव संयुक्त और साध्यासाध्य वातरक्त नष्ट होता है। इसको वातरक्तान्तक रस कहते हैं ॥ ४-८ ॥ तालभस्म । हरितालं पलं शुद्धं तथा कर्षं विषस्य च । श्वेताङ्कोठरसेनैव द्वयमेकत्र खल्लयेत् ॥ ९ ॥ पलाशभस्म द्विपलं निधाय स्थालिकोपरि । तद्भस्मोपरि तालस्य गोलकं स्थापयेत्सुधीः॥ १० ॥ तस्योपरि अपामार्गभस्म दद्यात्पलत्रयम् । स्थालीमुखे शरावञ्च दद्याद्यत्नेन लेपयेत् ॥ ११ ॥ लेपयित्वा ततश्चुल्यामहोरात्रं पचेद्भिषक् । ततस्तु जायते भस्म शुद्धकर्पूरसन्निभम् ॥ १२ ॥ गुञ्जात्रयं ततो भक्ष्यमनुपानविशेषतः । वातरक्तञ्च कुष्ठञ्च दद्रुविस्फोटकापचीम् ॥ १३ ॥ विचर्चिकां चर्मदलं वातरक्तञ्च शोणितम् । रक्तपित्तं तथा शोथं गलत्कुष्ठं विनाशयेत् ॥ हलीमकं तथा शूलमग्निमान्द्यमरोचकम् ॥ १४ ॥ शुद्ध हरिताल १ पल और विष १ कर्ष परिमाण लेवे । दोनोंको एकत्र सफेद अंकोलकी जड़के रसमें खरल करके पिंडसा बना लेवे । फिर एक हांडीमें दो पल परिमाण ढाकका खार बिछाकर