रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आजानुस्फुटितं घोरं सर्वाङ्ग-स्फुटितं तथा । तत्सर्वं नाशयेत्याशु साध्यासाध्यञ्च शोणितम् ॥३॥ कलिहारीकी जड़, त्रिकुटा, त्रिफला, दाख और गूगल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, लोहाभस्म ९ नव भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर बिजोरे नींबूके रसमें और त्रिफलेके रसमें खरल करके एक एक तोलेकी गोली बना लेवे । सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे जानुपर्यंत स्फुटित वातरक्त, सर्वांग स्फुटित वातरक्त और साध्यासाध्य वातरक्त नष्ट होता है । इसको लाङ्ग- ल्याद्य लोह कहते हैं ॥ १-३ ॥ वातरक्तान्तक रस । गन्धकं पारदं लौहं शिलां तालं घनं तथा । शिलाजतु पुरं शुद्धं समभागं विचूर्णयेत् ॥ ४ ॥ श्वेतापराजिता दार्वी वागुची चित्रकं तथा । पुनर्नवा देवकाष्ठत्रिफलाव्योषवेल्लकम् ॥ ५ ॥ चूर्णमेषां पृथक् तुल्यं सर्वमेकत्र कारयेत् । त्रिफलाभृंगराजस्य रसेनैव त्रिधा त्रिधा ॥ ६ ॥ भावयेद्भक्षयेत्पश्चाच्चणमात्रं दिने दिने । ततोनुपात्रं निम्बस्य पत्रं पुष्पं त्वचं समम् ॥ ७ ॥ शाणमानं घृतैः कुर्यात्सर्ववातविकारनुत् । वातरक्तं महाघोरं गम्भीरं सर्वजं च यत् ॥ सर्वोपद्रवसंयुक्तं साध्यासाध्यं निहन्त्यलम् ॥ ८ ॥ गंधक, पारा, लोहभस्म, मैनशिल, हरिताल, नागरमोथा, शिला- जीत, गूगल, सफेद कोइलकी जड़, दारुहलदी, बावची, चीतेकी जड़, पुनर्नवा, देवदारु, त्रिफला, त्रिकुटा और वायविडंग इन सब औषधियोंको