भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ३७१ ) दुर्नामभ्रान्तिवान्तिञ्च क्षिप्रमेव विनाशयेत् । रसः पित्तान्तको ह्येष काशिराजेन भाषितः ॥ ९ ॥ जावित्री, जायफल, वालछड़, कूट, तालीशपत्र, सोनामाखी, लोह- भस्म, अभ्रकभस्म, लौंग यह सब औषधि समान भाग और चाँदी- भस्म सबके बराबर लेकर जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके पित्तरोग, कोष्ठाश्रित पित्त, शाखाश्रित पित्त, शूल, अम्लपित्त, पाण्डुरोग, हलीमक, बवासीर, भ्रम और वमन शांत होते हैं । इसको काशिराज दिवोदासने कहा है॥६-९॥ महापित्तान्तक रस । यदात्र माक्षिकं त्यक्त्वा सुवर्णमपि दीयते । महापित्तान्तको नाम सर्वपित्तविनाशनः ॥ १० ॥ इति पित्तरोगचिकित्सा । पित्तान्तक रसमें जो औषधि कही हैं उनमेंसे सोनामाखीको निकाल- कर उसके स्थानमें सोनेकी भस्म डाले तो इसको महापित्तान्तक रस कहते हैं । इससे सर्व प्रकारके पित्तरोग नष्ट होते हैं ॥ १० ॥ इति पित्तरोगधिकार सम्पूर्ण । अथ वातरक्तरोगचिकित्सा । लाङ्गल्याद्य लोह । विशुद्धलाङ्गलीमूलत्रिकटुत्रिफलैस्तथा । द्राक्षागुग्गुलुभिस्तुल्यं लौहचूर्णं नियोजयेत् ॥ १ ॥ मातुलुङ्गरसेनैव त्रिफलाया रसेन च । विमृद्य यत्नतः पश्चाद्गुटिकां कोलसम्मिताम् । भक्षयेन्मधुना सार्द्धं शृणु कुर्वन्ति यान्गुणान् ॥ २ ॥