भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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पृष्ठ 396

( ३७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । धात्र्याश्च क्वाथेन तच्चूर्णं भाव्यञ्च सप्ताहम् । चण्डातपेन संशुष्कं भूयः पिष्टं घटे स्थितम् ॥ ३ ॥ घृतेन मधुना युक्तं भोजनाद्यन्तमध्यतः । त्रीन्वारान्भक्षयेन्नित्यं पथ्यं दोषानुबन्धतः ॥ ४ ॥ भुक्तस्यादौ नाशयेच्च दोषान्पित्तकृतानपि । मध्ये चानाहविष्टब्धं तथान्ते चाग्निमान्द्यताम् । रक्तपित्तसमुद्भूतान् रोगान् हन्ति न संशयः ॥ ५ ॥ आमलौंका चूर्ण ८ पल, लोहेकी भस्म ४ पल और मुलैठीका चूर्ण

  • २ पल इन सब औषधियोंको एकत्र करके आमलोंके क्वाथमें सात भावना देकर प्रचण्ड सूर्यकी धूपमें सुखाकर फिर मर्दन करे । पश्चात् इस औषधिको घृत और सहतके साथ भोजनकी आदि, अंत और मध्य अवस्थामें तीन वार सेवन करावे । इस औषधिके सेवनके अन्तमें यथादोषानुसार पथ्य देवे । भोजनकी आदिमें इस औषधिके सेवन करनेसे समस्त पित्तज रोग नष्ट होते हैं, भोजनकी मध्य अवस्थामें इस औषधिके सेवन करनेसे आनाह और विष्टब्धाजीर्ण शमन होते हैं, भोजनके अन्तमें सेवन करनेसे मन्दाग्नि और समस्त रक्तपित्तोत्पन्न रोग दूर होते हैं । इसको धात्रीलोह कहते हैं ॥ २-५ ॥ पित्तान्तक रस । जातीकोषफले मांसी कुष्ठं तालीशपत्रकम् । माक्षिकं मृतलौहञ्च अभ्रं दिव्यं समांशकम् ॥ ६ ॥ सर्वतुल्यं मृतं तारं समं निष्पिष्य वारिणा । द्विगुञ्जाभा वटी कार्या पित्तरोगविनाशिनी ॥ ७ ॥ कोष्ठाश्रितञ्च यत्पित्तं शाखाश्रितमथापि वा । शूलञ्चैवाम्लपित्तञ्च पाण्डुरोगं हलीमकम् ॥ ८ ॥