भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 395

भाषाटीकासहित । ( ३६९ ) आर्द्रकस्य रसेनैव मर्दयेद्याममात्रकम् । चणकाभा वटी कार्या सर्ववातप्रशान्तये ॥ कफरोगं निहंत्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३४ ॥ इति कफरोगाधिकारः । सिंग्रफ, इन्द्रजौ, सुहागा, भांगके बीज और काली मिरच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, रससिन्दूर ३ भाग इन सबको एकत्र खरल कर फिर अदरखके रसमें एक प्रहरपर्यन्त खरल करके चनेकी बराबर गोली बना सेवन करनेसे सर्व प्रकारके वातरोग और कफरोग ऐसे नष्ट होते हैं जिस प्रकार सूर्योदयसे अन्धकारका समूह नष्ट होता है । इसे कफचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ ३३॥ ३४ ॥ इति कफरोगाधिकार सम्पूर्ण । अथ पित्तरोगचिकित्सा । गुडूच्यादिलोह । गुडूचीसारसंयुक्तं त्रिकत्रययुतन्त्वयः । वातरक्तं निहन्त्याशु सर्ववातहरं परम् ॥ १ ॥ गिलोयका सत्त, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोहेकी भस्म १० भाग लेवे । इन सब औषधि- योंको एकत्र खरल करके यथामात्राकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे वातरक्त और सर्व प्रकारके वातरोग नष्ट होते हैं । इसको गुडूच्यादि लोह कहते हैं ॥ १ ॥ धात्रीलोह । धात्रीचूर्णस्याष्टौ पलानि चत्वारि लौहचूर्णस्य । यष्टीमधुकरजश्च द्विपलं दद्यात्पुटे घृष्टम् ॥ २ ॥