रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जाता है तथा वृद्ध मनुष्य भी युवाके समान स्पर्द्धायुक्त होता है । कदापि शुक्रक्षय नहीं होता, लिंगमें शिथिलता नहीं उत्पन्न होती, बाल सुफेद् नहीं होते, उन्मत्त हाथीके समान प्रतिदिन सैकड़ों स्त्रियोंसे रमण करनेको समर्थ होता है, दो लक्ष योजन तक देखनेको समर्थ हो जाता है और शरीरमें पुष्टिकी वृद्धि होती है । जगत्पति श्रीकृष्ण भगवान् इसी औषधिका सेवन करके लक्ष स्त्रियोंके साथ विषय करनेको समर्थ हुए थे । इस उत्तम औषधिको महात्मा नारदजीने कहा है । इसको महालक्ष्मीविलास रस कहते हैं ॥ २५-२९ ॥ कफकेतु रस । टङ्कणं मागधी शङ्खं वत्सनाभं समं समम् । आर्द्रकस्य रसेनापि भावयेद्दिवसत्रयम् ॥ ३० ॥ गुञ्जामात्रं प्रदातव्यमार्द्रकस्य रसेन वै । पीनसं श्वासकासं च गलरोगं गलग्रहम् ॥ ३१ ॥ दन्तरोगं कर्णरोगं नेत्ररोगं सुदारुणम् । सन्निपातं निहन्त्याशु कफकेतुरसोत्तमः ॥ ३२ ॥ सुहागा, पीपल, शंखकी भस्म और विष यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसमें तीन भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । अदरखके रसके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे पीनस, श्वास, खाँसी, गलरोग, गलेकी पीड़ा, दन्तरोग, कर्णरोग, नेत्ररोग और सन्निपात रोग नष्ट होते हैं । इसको कफकेतु रस कहते हैं ॥ ३०-३२ ॥ कफचिन्तामणि रस । हिंगुलेन्द्रयवं टङ्कं त्रैलोक्यबीजमेव च । मरिचञ्च समं सर्वं त्रिभागं रससिन्दुरम् ॥ ३३ ॥