भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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(३७६) रसेन्द्रसारसंग्रह । कुष्ठ रोगमें जो औषधि कही हैं वह सब औषधि इस वातरक्त रोगमें भी प्रयुक्त करनी चाहिये तथा इस रोगमें रोगीके शरीरमेंसे रुधिर निकलवाना चाहिये ॥ २३ ॥ इति वातरक्ताधिकार संपूर्ण । अथ ऊरुस्तम्भरोगचिकित्सा । गुञ्जाभद्र रस । निष्कत्रयं शुद्धसूतं निष्कद्वादश गन्धकम् । गुञ्जाबीजञ्च षड्निष्कं जयन्तीनिम्बबीजकम् ॥ १ ॥ प्रत्येकं निष्कमात्रन्तु निष्कं जैपालबीजकम् । जयाजम्बीरधूस्तूरकाकमाचीद्रवैर्दिनम् ॥ २ ॥ भावयित्वा वटीं कुर्याच्चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः । गुञ्जाभद्ररसो नाम हिंगुसैन्धवसंयुतः ॥ शमयत्युल्बणं दुःखमूरुस्तम्भं सुदारुणम् ॥ ३ ॥ पारा ३ निष्क, गंधक १२ निष्क, सफेद घुंघुचीके बीज ६ निष्क, जयंतीके बीज, नीमके बीज और जमालगोटे यह प्रत्येक औषधि एक एक निष्क (चार मासे) लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर भांग, जम्भीरी नींबू, धतूरेके पत्ते और मकोय इन प्रत्येकके रसमें एक एक भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको हींग और सेंधानमकके साथ सेवन करे तो दारुण ऊरुस्तम्भ रोग दूर होता है । इसको गुञ्जाभद्र रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ शिलाजतु गुग्गुलु वा पिप्पलीमथ नागरम् । ऊरुस्तम्भे पिबेन्मूत्रैर्दशमूलीरसेन वा ॥ ४ ॥ प्लीहाधिकारे कथितं रसेन्द्रवारिशोषणम् । ऊरुस्तम्भे प्रयुञ्जीत चान्यद्वा योगवाहिकम् ॥ ५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे ऊरुस्तम्भाधिकारः ।