भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ३७९ ) टङ्कणार्द्धं विडं देयं मरिचं विडतुल्यकम् । तिन्तिडी क्षारतुल्यञ्च सूततुल्यञ्च दंतिकम् ॥ १२॥ त्रिकटुतित्रिफलश्चैव लवङ्गश्चार्द्धभागिकम् । आमवातेश्वरो नाम विष्णुना परिकीर्त्तितः ॥ १३ ॥ महाग्निकारको ह्येष आमवातान्तको मतः । स्थूलानां कर्षणः श्रेष्ठः कृशानां स्थौल्यकारकः १४ अनुपानविशेषेण सर्वरोगविनाशनः । अनेन सदृशो नास्ति वह्निदीप्तिकरो महान् ॥ गुल्मार्शोग्रहणीदोषशोथपाण्डुरुजापहः ॥ १५ ॥ शुद्ध गंधक २ तोले, तांबाभस्म २ तोले, पारा १ तोला, लोहभस्म १ तोला इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एरंडकी जड़के रसमें सात वार भावना देकर पश्चात् पंचकोलके क्वाथमें बीस वार भावना देवे और गिलोयके रसमें दश वार भावना देवे । पश्चात् इसमें सुहागा ६ तोला, विडनमक ३ तोला, काली मिरच ३ तोला, इमलीका खार ३ तोला, दंतीके बीज १ तोला तथा सोंठ, पीपल, काली मिरच, हरड़, बहेड़ा, आमला और लौंग यह प्रत्येक औषधि छः छः मासे लेकर अच्छे प्रकारसे खरल कर यह औषधि सेवन करनेसे अत्यन्त अग्निको दीप्त करनेवाली, आमवातनाशक, स्थूल मनुष्योंको कृश करने- वाली, कृश मनुष्योंको स्थूल करनेवाली और अनुपान विशेषसे सर्व- रोगनाशक है। इसकी समान अग्निको दीप्त करनेवाली अन्य औषधि नहीं है । इससे गुल्म, बवासीर, संग्रहणी, शोथ और पांडुरोग नष्ट होते हैं । इस आमवातेश्वर रसको स्वयं विष्णु भगवान्ने कहा है ॥ ९-१५ ॥ वृद्धदाराद्य लोह । वृद्धदारत्रिवृद्दन्तीगजपिप्पलिमानकैः । त्रिकत्रयसमायुक्तैरामवातान्तकन्त्वयः ॥ सर्वानैव गदान् हन्ति केशरी करिणो यथा ॥१६॥