रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विधारेके बीज, निसोधकी जड़, दंतीकी जड़, गजपीपल, मानकंद, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रक, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहभस्म १४ भाग लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ १६ ॥ शिवागुग्गुलु । शिवाविभीतामलकीफलानां प्रत्येकशो मुष्टि- चतुष्टयञ्च । तोयाढके तत्कथितं विधाय पादाव- शेषे त्ववतारणीयम् ॥ १७॥ एरण्डतैलं द्विपलं निधाय पिचुत्रयं गन्धकनामकस्य। पचेत्पुरस्यात्र पलद्वयञ्च पाकावशेषे च विचूर्ण्य दद्यात् ॥१८॥ रास्ना विडंगं मरिचं कणा च दन्ती जटा नागर- देवदारु । प्रत्येकशः कोलमितं तथैषां विचूर्ण्य निःक्षिप्य नियोजयेच्च ॥ १९ ॥ आमवाते कटी- शूले गृध्रसीक्रोष्टुशीर्षके । न चान्यदस्ति भेषज्यं यथाऽयं गुग्गुलुः स्मृतः ॥ २० ॥ हरड़ १६ तोले, बहेड़ा १६ तोले, आमले १६ तोले परिमाण लेकर ८ सेर जलमें पकावे, जब पकते पकते जल चौथाई भाग बाकी रह जाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इस क्वाथमें दो पल एरंडीका तेल, गंधक ३ तोले और गूगल २ पल डालकर मंद मंद अग्निसे पकावे । जब पाक समाप्त हो जाय तब इसमें रास्नाका चूर्ण, वायविडं- गका चूर्ण, काली मिरचोंका चूर्ण, पीपलका चूर्ण, दंतिमूल, सोंठका चूर्ण और देवदारुका चूर्ण प्रत्येक एक एक तोला डालकर उतार लेवे । आमवात, कटीशूल, गृध्रसी और क्रोष्टुशीर्षक प्रभृति रोगोंका नाशक इसके समान अन्य औषधि नहीं है ॥ १७-२० ॥