रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३६५ ) सम्हालके पत्तोंका रस, अरणीकी जड़का रस, अडूसेके पत्तोंका रस, भांगके पत्तोंका रस, कटेरीका रस, धतूरेके पत्तोंका रस, काले जीरेका क्वाथ, फरहदका क्वाथ, पीपलका क्वाथ और अदरखका रस इन प्रत्ये- कके रसमें अलग २ मर्दन करके सात सात वार भावना देकर गोली बना लेवे । उष्ण जलके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे बीस प्रका- रके कफके रोग, त्रिदोष व्याधि, आठ प्रकारके उदररोग, बवासीर, आमवात, पांच प्रकारका पांडु रोग, क्रिमि और मेदरोग नष्ट होते हैं । जिस प्रकार सूखे काष्ठमें अग्नि शीघ्र ही प्रविष्ट होकर प्रचण्ड हो जाती है उसी प्रकार इस औषधिसे जठरानल दीप्त होती है । इसको श्लेष्मशैलेन्द्र रस कहते हैं ॥ ५-१२ ॥ महाश्लेष्मकालानल रस । हिंगुलसम्भवं सूतं शिलागन्धकटंकणम् । ताम्रं वङ्गं तथाभ्रञ्च स्वर्णमाक्षिकतालकम् ॥ १३ ॥ धूस्तूरं सैन्धवं कुष्ठं हिंगु पिप्पलिकट्फलम् । दन्तीबीजं सोमराजी वनराजफलत्रिवृत् ॥१४॥ वज्रीक्षीरेण संमर्द्य वटिकां कारयेद्भिषक् । कलायपरिमाणान्तु खादेदेकां यथाबलम् ॥ १५ ॥ सन्निपातं निहन्त्याशु वृक्षमन्द्राशनिर्यथा । मदसिंहो यथारण्ये मृगाणां कुलनाशनः ॥ तथाऽयं सर्वरोगाणां सद्यो नाशकरो महान् ॥ १६ ॥ सिंग्रफसे निकाला हुआ पारा, मैनशिल, गंधक, सुहागा, तांबा- भस्म, वंगभस्म, अभ्रकभस्म, सोनामाखीभस्म, हरिताल, धतूरेके बीज, सेंधानमक, कूठ, हींग, पीपल, कायफल, दंतीके बीज, बाव- चीके बीज, अमलतासकी फली और निसोतकी जड़ इन सब औष- धियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके मटरकी बरा- १३