रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 389, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३६३ ) सहतके साथ और प्रमेह रोगमें दूधके साथ इस औषधिको भक्षण करे । इस औषधिके सेवन करनेसे बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है। कासरोग, कफरोग और सब प्रकारके वायुरोग नष्ट होते हैं। आयु, पुष्टि और शुक्रकी वृद्धि होती है तथा सब प्रकारके रोग नष्ट होते हैं। इसको त्रैलोक्याचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ ९१-९३ ॥ इति वातव्याधिचिकित्सा । अथ कफरोगाधिकार । श्लेष्मकालानल रस । रसस्य द्विगुणं गन्धं गन्धकाद्विगुणं विषम् । विषात्तु द्विगुणं देयं चूर्णं त्रिकटुसम्भवम् ॥ १ ॥ रसतुल्या प्रदातव्या चाभया सविभीतकी । धात्रीपुष्करमूलञ्च अजमोदाजगन्धिका ॥ २ ॥ विडङ्गं कट्फलं चव्यं पञ्चैव लवणानि च । लवङ्गं त्रिवृता दन्ती सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ॥ ३ ॥ भावयेत्सप्तधा रौद्रे स्वरसैः सुरसोद्भवैः । हन्ति सर्वं कफोद्भूतं व्याधिं कालानलो रसः ॥ ४ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, विष ४ भाग, त्रिकुटेका चूर्ण ८ भाग, हरड़ १ भाग, बहेड़ा १ भाग, आमला १ भाग, कूठ १ भाग, अजवायन १ भाग, अजमोद १ भाग, वायविडंग १ भाग, कायफल १ भाग, चव्य १ भाग, पांचों लवण ५ भाग, लौंग १ भाग, निसोध १ भाग और दंती १ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीस- कर तुलसीके रसमें सात भावना देवे । इसके सेवन करनेसे समस्त कफज रोग नष्ट होते हैं। इसको श्लेष्मकालानल रस कहते हैं ॥१-४॥