भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ३८४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पूजा करके घृत और सहतमें मिलाकर एक मासे परिमाण इस औष- धिको भक्षण करे और फिर प्रतिदिन एक एक मासे बढ़ाता जाय; जब आठ मासे पर्यंत हो जाय तब आगेको मात्रा नहीं बढ़ावे । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें नारियलका जल और गायका दूध पीवे । जब औषधि जीर्ण हो जाय तब लाल रंगके शालि चावलोंका भात, मूंगका यूष और मांसयूष घृतके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे शूलरोग, हृदयशूल, पार्श्वशूल, आमवात, कटिपीड़ा, गुल्मशूल, और शिरःशूल नष्ट होते हैं । इसको चतुःसम लोह कहते हैं॥४-१०॥ पञ्चात्मक रस । मृतसूताभ्रकं चाम्लवेतसं ताम्रगन्धकम् । विषं फलत्रयाच्चूर्णं तुल्यं मर्द्यं दिनावधि ॥ ११ ॥ जयन्ती मुण्डिरी वासा बृहती च गुडूचिका । महाराष्ट्री जम्बुरसैस्तथा नीलोत्पलस्य च ॥१२॥ प्रतिद्रावैर्दिनं भाव्यं ततः संशोष्य यत्नतः । अर्द्धांशं पञ्चलवणं दत्त्वार्द्रकरसेन च ॥ १३ ॥ दिनं पेष्यं ततः कुर्याद्वटिकां चणसन्निभाम् । प्रातर्मध्याह्ने रात्रौ च भक्षयेद्वटिकात्रयम् ॥१४॥ माषेक्षुपिष्टगुर्वन्नं गोपयश्च हितं तथा । सेवेत वातशूलार्त्तश्चायं पञ्चात्मकः स्मृतः ॥ १५ ॥ पारेकी भस्म, अभ्रकभस्म, अम्लवेत, तांबेकी भस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध विष और त्रिफला यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर सबको एकत्र पीसकर जयंती, गोरखमुण्डी, अडूसा, कटेरी, गिलोय, भारंगी, जामुनकी छाल और नील कमल इन प्रत्येकके रसके द्वारा एक एक भावना देकर और सब औषधियोंसे आधे भाग पांचों लवण