रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 413, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३८७ ) कान्तलोहभस्म १ कर्ष, अभ्रक १ पल, मिश्री १ पल, सहत १ पल और घृत १ पल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर लोहेके डंडेसे खरल करे । फिर त्रिकुटेका चूर्ण ३ तोले, त्रिफलेका चूर्ण ३ तोले, नागरमोथेका चूर्ण एक तोला, वायविडंगका चूर्ण १ तोला, चव्यका चूर्ण १ तोला और चीतेकी जड़का चूर्ण १ तोला मिलावे । प्रतिदिन प्रातःकाल शीतल जलके साथ भक्षण करनेसे त्रिदोषज शूल, कटिशूल, हृदयशूल, पार्श्वशूल, अम्लपित्त, बवासीर, प्रमेह और विसूचिकारोग नष्ट होते हैं । यह शूलराज लोह महादेवने कहा है ॥ २४-२८ ॥ विद्याधराभ्र रस । विडङ्गमुस्तत्रिफलागुडूची दन्ती त्रिवृद्वह्निकटुत्र- यञ्च । प्रत्येकमेषां पिचुभागचूर्णं पलानि चत्वार्य- यसो मलस्य ॥ २९ ॥ गोमूत्रशुद्धस्य पुरातनस्य यद्वायसस्तानिश्शिवाटिकायाः । कृष्णाभ्रचूर्णस्य पलं विशुद्धं निश्चन्द्रकं शुद्धमतीव सूतात् ॥ ३० ॥ पादोनकर्षं स्वरसेन खल्ले शिलातले थानकुनी- दलस्य । संमर्द्य पश्चादतिशुद्धगन्धपाषाणचूर्णेन पिचुन्मितेन ॥३१॥ युक्त्या ततः पूर्वरजांसि दत्त्वा सर्पिर्मधुभ्यामवमर्द्य यत्नात् । निधापयेत्स्निग्ध- विशुद्धभाण्डे ततः प्रयोज्योऽस्य रसायनस्य॥३२॥ प्राङ्माषको वाप्यथवा द्वितीयो गव्यं पयो वा शिशिरं जलं वा । पिबेदयं योगवरः प्रभूतकाल- प्रनष्टानलदीपकश्च ॥ ३३ ॥ गोरखमुंडीके पत्तोंके रसके द्वारा शुद्ध किया हुआ पारा ९ मासे और शुद्ध गन्धक १ कर्ष लेवे । दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली