रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पञ्चानन रस । पारदं शिखितुत्थञ्च गन्धं जैपालपिप्पली । आरग्वधफलान्मज्जा वज्रीक्षीरेण पेषयेत् ॥ २ ॥ धात्रीरसयुतं खादेद्रक्तगुल्मप्रशान्तये । चिञ्चाफलरसञ्चानु पथ्यं दध्योदनं हितम् ॥ ३ ॥ पारा, तूतिया, गन्धक, जमालगोटे, पीपल और अमलतासका गूदा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके उपरोक्त मात्रानुसार आमलोंक रसके साथ सेवन करनेसे अंतमें इमलीके रसको पीवे । तथा दहीके साथ भात खावे । इसको पञ्चानन रस कहते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ गुल्मवज्रिणी रस । रसगन्धकताम्रञ्च कांस्यं टङ्कणतालकम् । प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं मर्दयेदतियत्नतः ॥ ४ ॥ तद्यथाग्निबलं खादेद्रक्तगुल्मप्रशान्तये । निर्मिता नित्यनाथेन वटिका गुल्मवज्रिणी ॥ ५ ॥ गुल्मप्लीहोदराष्ठीलायकृदानाहनाशिनी । कामलापाण्डुरोगघ्नी ज्वरशूलविनाशिनी ॥ ६ ॥ पारा, तांवाभस्म, कांसाभस्म, सुहागा, हरितालभस्म और गन्धक यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके अग्निके बलानुसार मात्रा सेवन करनेसे रक्तगुल्मरोग नष्ट होता है । इस औषधिके सेवन करनेसे गुल्म, प्लीहा, उदर, अष्ठीला, यकृत, आनाह, कामला, पांडु, ज्वर और शूलरोग नष्ट होते हैं । श्रीमन्नित्यनाथ सिद्धने इस गुल्मवज्रिणी वटिकाको कहा है ॥ ४-६॥