भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 423

भाषाटीकासहित । ( ३९७ ) योगवाहिरसान्सर्व्वान् रेचके कथितानपि । प्लीहाधिकारे कथितं रसेन्द्रं वारिशोषणम् । उदावर्त्ते तथानाहे प्रयुञ्जीतानुपानतः ॥ ५ ॥ रेचनकारक योगवाही संपूर्ण रसोंको तथा प्लीहारोगोक्त वारि- शोषण रसको यथायोग्य अनुपानाेंके साथ उदावर्त्त और आनाह रोगमें प्रयुक्त करना चाहिये ॥ ५ ॥ पुटितं भावितं लौहं त्रिवृत्क्वाथैरनेकंशः । उदावर्त्तहरं युंज्यात्ससितं वा यथाबलम् ॥ उदावर्त्ते प्रयोक्तव्या उदरोक्ता रसाः खलु ॥ ६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे उदावर्त्तानाहाधिकारः । निसोथके रसकी भावना देकर भस्म किये हुए लोहेको निसोथकी जड़के क्वाथमें सात वार भावना देकर मिश्रीके साथ उदावर्त्तरोगमें यथोचित मात्रानुसार सेवन करे । उदावर्त्त रोगमें समस्त उदररोगाधिकारोक्त औषधि प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ६ ॥ इति उदावर्त्तानाहरोगचिकित्सा । अथ गुल्मरोगचिकित्सा । महानाराच रस । ताम्रं सूतं समं गन्धं जैपालञ्च फलत्रिकम् । कटुकं पेषयेत्क्षारैर्निष्कं गुल्महरं पिबेत् ॥ उष्णोदकं पिबेच्चानु नाराचोऽयं महारसः ॥ १ ॥ तांबेकी भस्म, पारा, गन्धक, जमालमोटा, त्रिफला, कुटकी और क्षारत्रय यह सब औषधि समान भाग लेकर पीसकर तीन तीन मासेकी गोली बना लेवे । एक गोली एक वार खाय तो गुल्मरोग अवश्य नष्ट होजाता है । इसके सेवन करनेके अंतमें गरमजल पान करे । इसको महानाराच रस कहते हैं ॥ १ ॥ ॰१४