रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पत्तोंके रस और नोनियाके पत्तोंके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे उदर, गुल्म, पांडु, क्रिमि, कुष्ठ, गात्रकण्डू और पिड़िकारोग प्रभृति नष्ट होते हैं। इस वैद्यनाथवटीको स्वयं महादेवने कहा है ॥ १ ॥ २ ॥ बृहदिच्छाभेदी रस । शुद्धं पारदटंकणं समरिचं गन्धाश्मतुल्यं त्रिवृद्, विश्वा च द्विगुणा ततो नवगुणं जैपालचूर्णं क्षिपेत् । खल्वे दण्डयुगं विमर्द्य विधिना चार्कस्य पत्रे ततः, स्वेदं गोमयवह्निना च मृदुना स्वेच्छावशाद्भेदकः॥३॥ गुञ्जैकप्रमितो रसो हिमजलैः संसेवितो रेचये- द्यावन्नोष्णजलं पिबेदपि वरं पथ्यञ्च. दध्योदनम् । आमं सर्वभवं सुजीर्णमुदरं गुल्मं विशालं हरे- द्देहदीप्तिकरो बलासहरणः सर्वामयध्वंसनः ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा, सुहागा, काली मिरच, गन्धक और निसोथकी जड़, यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, सोंठ २ भाग लेवे और जमालगोटेका चूर्ण नव ९ भाग, इन सब औषधियोंको दो दण्ड ( एक दण्डके २४ मिनट ) पर्यन्त मर्दन करके आकके पत्तोंमें लपेट मूषामें रखकर जंगली उपलोंकी अग्निसे धीरे २ पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण कर ले । इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर शीतल जलके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेपर जबतक गरम जल नहीं पीवे तबतक बराबर दस्त होते रहते हैं । इस औषधिको भक्षण करके ऊपरसे दहीके साथ भात खावे । इस औषधिके सेवन करनेसे आमदोष, त्रिदोषज उदररोग और गुल्मरोग नष्ट होते हैं। यह अत्यंत अग्निप्रदीपक, कफनाशक और सर्व रोगोंका हरनेवाला है । इसको बृहत्- इच्छाभेदी रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥