रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
( ३९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पत्तोंके रस और नोनियाके पत्तोंके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे उदर, गुल्म, पांडु, क्रिमि, कुष्ठ, गात्रकण्डू और पिड़िकारोग प्रभृति नष्ट होते हैं। इस वैद्यनाथवटीको स्वयं महादेवने कहा है ॥ १ ॥ २ ॥ बृहदिच्छाभेदी रस । शुद्धं पारदटंकणं समरिचं गन्धाश्मतुल्यं त्रिवृद्, विश्वा च द्विगुणा ततो नवगुणं जैपालचूर्णं क्षिपेत् । खल्वे दण्डयुगं विमर्द्य विधिना चार्कस्य पत्रे ततः, स्वेदं गोमयवह्निना च मृदुना स्वेच्छावशाद्भेदकः॥३॥ गुञ्जैकप्रमितो रसो हिमजलैः संसेवितो रेचये- द्यावन्नोष्णजलं पिबेदपि वरं पथ्यञ्च. दध्योदनम् । आमं सर्वभवं सुजीर्णमुदरं गुल्मं विशालं हरे- द्देहदीप्तिकरो बलासहरणः सर्वामयध्वंसनः ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा, सुहागा, काली मिरच, गन्धक और निसोथकी जड़, यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, सोंठ २ भाग लेवे और जमालगोटेका चूर्ण नव ९ भाग, इन सब औषधियोंको दो दण्ड ( एक दण्डके २४ मिनट ) पर्यन्त मर्दन करके आकके पत्तोंमें लपेट मूषामें रखकर जंगली उपलोंकी अग्निसे धीरे २ पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण कर ले । इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर शीतल जलके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेपर जबतक गरम जल नहीं पीवे तबतक बराबर दस्त होते रहते हैं । इस औषधिको भक्षण करके ऊपरसे दहीके साथ भात खावे । इस औषधिके सेवन करनेसे आमदोष, त्रिदोषज उदररोग और गुल्मरोग नष्ट होते हैं। यह अत्यंत अग्निप्रदीपक, कफनाशक और सर्व रोगोंका हरनेवाला है । इसको बृहत्- इच्छाभेदी रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३९७ ) योगवाहिरसान्सर्व्वान् रेचके कथितानपि । प्लीहाधिकारे कथितं रसेन्द्रं वारिशोषणम् । उदावर्त्ते तथानाहे प्रयुञ्जीतानुपानतः ॥ ५ ॥ रेचनकारक योगवाही संपूर्ण रसोंको तथा प्लीहारोगोक्त वारि- शोषण रसको यथायोग्य अनुपानाेंके साथ उदावर्त्त और आनाह रोगमें प्रयुक्त करना चाहिये ॥ ५ ॥ पुटितं भावितं लौहं त्रिवृत्क्वाथैरनेकंशः । उदावर्त्तहरं युंज्यात्ससितं वा यथाबलम् ॥ उदावर्त्ते प्रयोक्तव्या उदरोक्ता रसाः खलु ॥ ६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे उदावर्त्तानाहाधिकारः । निसोथके रसकी भावना देकर भस्म किये हुए लोहेको निसोथकी जड़के क्वाथमें सात वार भावना देकर मिश्रीके साथ उदावर्त्तरोगमें यथोचित मात्रानुसार सेवन करे । उदावर्त्त रोगमें समस्त उदररोगाधिकारोक्त औषधि प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ६ ॥ इति उदावर्त्तानाहरोगचिकित्सा । अथ गुल्मरोगचिकित्सा । महानाराच रस । ताम्रं सूतं समं गन्धं जैपालञ्च फलत्रिकम् । कटुकं पेषयेत्क्षारैर्निष्कं गुल्महरं पिबेत् ॥ उष्णोदकं पिबेच्चानु नाराचोऽयं महारसः ॥ १ ॥ तांबेकी भस्म, पारा, गन्धक, जमालमोटा, त्रिफला, कुटकी और क्षारत्रय यह सब औषधि समान भाग लेकर पीसकर तीन तीन मासेकी गोली बना लेवे । एक गोली एक वार खाय तो गुल्मरोग अवश्य नष्ट होजाता है । इसके सेवन करनेके अंतमें गरमजल पान करे । इसको महानाराच रस कहते हैं ॥ १ ॥ ॰१४
( ३९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पञ्चानन रस । पारदं शिखितुत्थञ्च गन्धं जैपालपिप्पली । आरग्वधफलान्मज्जा वज्रीक्षीरेण पेषयेत् ॥ २ ॥ धात्रीरसयुतं खादेद्रक्तगुल्मप्रशान्तये । चिञ्चाफलरसञ्चानु पथ्यं दध्योदनं हितम् ॥ ३ ॥ पारा, तूतिया, गन्धक, जमालगोटे, पीपल और अमलतासका गूदा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके उपरोक्त मात्रानुसार आमलोंक रसके साथ सेवन करनेसे अंतमें इमलीके रसको पीवे । तथा दहीके साथ भात खावे । इसको पञ्चानन रस कहते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ गुल्मवज्रिणी रस । रसगन्धकताम्रञ्च कांस्यं टङ्कणतालकम् । प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं मर्दयेदतियत्नतः ॥ ४ ॥ तद्यथाग्निबलं खादेद्रक्तगुल्मप्रशान्तये । निर्मिता नित्यनाथेन वटिका गुल्मवज्रिणी ॥ ५ ॥ गुल्मप्लीहोदराष्ठीलायकृदानाहनाशिनी । कामलापाण्डुरोगघ्नी ज्वरशूलविनाशिनी ॥ ६ ॥ पारा, तांवाभस्म, कांसाभस्म, सुहागा, हरितालभस्म और गन्धक यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके अग्निके बलानुसार मात्रा सेवन करनेसे रक्तगुल्मरोग नष्ट होता है । इस औषधिके सेवन करनेसे गुल्म, प्लीहा, उदर, अष्ठीला, यकृत, आनाह, कामला, पांडु, ज्वर और शूलरोग नष्ट होते हैं । श्रीमन्नित्यनाथ सिद्धने इस गुल्मवज्रिणी वटिकाको कहा है ॥ ४-६॥
भाषाटीकासहित । ( ३९९ ) गुल्मलानल रस । सूतकं लौहकं ताम्रं तालकं गन्धकं समम् । तोलद्वयमितं भागं यवक्षारञ्च तत्समम् ॥ ७ ॥ मुस्तकं मरिचं शुण्ठी पिप्पली गजपिप्पली । हरीतकी वचा कुष्ठं तोलैकं चूर्णयेद् बुधः ॥ ८ ॥ सर्वमेकीकृतं पात्रे क्रियन्ते भावनास्ततः । पर्पटं मुस्तकं शुंठ्यपामार्गं पापचेलिकम् ॥ ९ ॥ तत्पुनश्चूर्णयेत्पश्चात्सर्वगुल्मनिवारणम् । गुञ्जाचतुष्टयं खादेद्धरीतक्यनुपानतः ॥ १० ॥ वातिकं पैत्तिकं गुल्मं तथा चैव त्रिदोषजम् । द्वन्द्वजं श्लैष्मिकं हन्ति वातगुल्मं विशेषतः ॥ गुल्मकालानलो नाम सर्वगुल्मकुलान्तकृत् ॥ ११ ॥ पारा, लोहभस्म, तांबाभस्म, हरितालभस्म और गन्धक यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले और जौखार १० तोले लेवे । तथा नागर- मोथा, कालीमिरच, सोंठ, पीपल, गजपीपल, हरड़, वच और कूठ यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर पित्तपापड़ा, नागरमोथा, सोंठ, चिरचिटा और पाठा इन प्रत्येकके रसकी सात सात भावना देकर चूर्ण कर लेवे । हरड़के चूर्णके साथ अथवा हरड़के काथके साथ चार रत्ती परिमाण औष- धिके सेवन करनेसे वातज, पित्तज, त्रिदोषज, द्विदोषज और कफज प्रभृति सर्वगुल्म रोग नष्ट होते हैं । इसको गुल्मकालानल रस कहते हैं ॥ ७-११ ॥ वडवानल रस । पारदं गन्धकं ताप्यं यवक्षारार्कमभ्रकम् । अग्न्यम्बुनाहिपत्रेण समर्द्याथ द्विगुञ्जकम् ॥ १२ ॥
( ४०० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । भक्षयेत्पर्णखण्डेन हिंगुसिन्धुसुवर्चलैः । दाडिमञ्च तथा बिल्वं कार्षिकं भृङ्गजैर्द्रवैः ॥ १३ ॥ पिष्ट्वा तु सुरया युक्तं देयं स्यादनुपानकम् । सर्वगुल्मं निहन्त्याशु शूलञ्च परिणामजम् ॥ १४ ॥ पारा, गन्धक, सोनामाखीभस्म, जवाखार, तांबाभस्म और अभ्रक- भस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर चीतेकी जड़के क्वाथ और आकके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे; इसको पानमें रखकर खावे । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें हींग, सेंधानमक, कालानमक, अनार और बेलगिरी इन सबको एक एक कर्ष परिमाण लेकर भांगरेके रसमें खरल करके मदिराके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके गुल्म और परिणामशूल नष्ट होते हैं । इसको वडवानल रस कहते हैं ॥ १३-१४ ॥ महानाराच रस । सूतटङ्कणतुल्यांशं मरिचं सूततुल्यकम् । गन्धकं पिप्पली शुण्ठी द्वौ द्वौ भागौ विमिश्रयेत् १५ सर्वतुल्यं क्षिपेद्दन्तीबीजं निस्तुषमेव च । द्विगुञ्जं रेचनं सिद्धं नाराचाख्यो महारसः ॥ १६ ॥ पारा, सुहागा और कालीमिरच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग; गंधक, पीपल और सोंठ यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग और दंतीके बीज ( जमालगोटे ) नव ९ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीस- कर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अच्छे प्रकारसे विरेचन होजाता है । इसको महानाराच रस कहते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ विद्याधर रस । पारदं गन्धकं तालं ताप्यं स्वर्णं मनःशिलाम् । कृष्णाक्वाथैः स्नुहीक्षीरैर्दिनैकं मर्दयेत्सुधीः ॥१७॥
भाषाटीकासहित । ( ४०१ ) निष्कार्द्धं श्लैष्मिकं गुल्मं हन्ति मूत्रानुपानतः । रसो विद्याधरो नाम गोदुग्धञ्च पिबेदनु ॥१७८॥ पारा, गंधक, हरितालभस्म, सोनामाखीभस्म, सोनाभस्म और मनशिल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर पीपलके काथ और थूहरके दूधमें एक दिनतक खरल करके दो दो मासेकी गोली बनाकर गोमूत्रके साथ सेवन करे और ऊपरसे गायका दूध पीवे तो कफजन्य गुल्म रोग नष्ट होता है । इसे विद्याधररस कहते हैं॥१७॥१८॥ महागुल्मकालानल रस । गन्धकं तालकं ताम्रं तथैव तीक्ष्णलोहकम् । समांशं मर्दयेद् गाढं कन्यानीरेण यत्नतः ॥ १९ ॥ संपुटं कारयेत्पश्चात्सन्धिलेपञ्च कारयेत् । ततो गजपुटं दत्त्वा स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ २० ॥ द्विगुञ्जं भक्षयेद् गुल्मी शृंगवेरानुपानतः । सर्वगुल्मं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥२१॥ गंधक, हरितालभस्म, तांबाभस्म, तीक्ष्णलोहभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर घीकारके रसमें अच्छे प्रकारसे गोला बना लेवे । पश्चात् इस औषधिके पिंडको मूषामें रखकर उसके जोड़ोंको अच्छे प्रकारसे बंद करके गजपुटमें पकावे । शीतल होनेपर औषधिको चूर्ण करके दो रत्ती परिमाण लेकर अदरखके रसके साथ सेवन करे । जिस प्रकार सूर्योदयसे अंधकारका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औष- धिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारका गुल्म नष्ट होता है । इसको महा- गुल्मकालानल रस कहते हैं ॥ १९-२१.॥ अभया वटी । अभया मरिचं कृष्णा टंकणञ्च समांशकम् । सर्वचूर्णसमञ्चैव दद्यात्कानकजं फलम् ॥ २२ ॥
( ४०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । स्नुहीक्षीरैर्वटी कार्या यथा स्विन्नकलायवत् । वटीद्वयं शिवामेकां पिष्ट्वा चोष्णाम्बुना पिबेत् २३॥ उष्णाद्विरेचयेदेषा शीते स्वास्थ्यमुपैति च । जीर्णज्वरं पाण्डुरोगं प्लीहाष्ठीलोदराणि च ॥ रक्तपित्ताम्लपित्तादिसर्वाजीर्णं विनाशयेत् ॥ २४ ॥ हरड़, कालीमिरच, पीपल और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और जमालगोटे ४ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर थूहरके दूधमें खरल करके सीजे हुए मटरके दानेकी बराबर गोली बना लेवे । इन गोलियोंमेंसे दो गोली और एक हरड़को एकत्र पीसकर गरम जलके साथ सेवन करे । इस औषधिका सेवन करके उष्ण क्रिया आचरण करे तो दस्त बराबर होते रहते हैं और शीतल क्रिया व्यवहार करनेसे दस्त बंद होजाते हैं । इस औष- धिके सेवन करनेसे जीर्णज्वर, पांडुरोग, प्लीहा, अष्ठीला, उदररोग, रक्तपित्त, अम्लपित्त और सर्व प्रकारके अजीर्णरोग नष्ट होते हैं । इसको अभयावटी कहते हैं ॥ २३-२४ ॥ गोपीजल । जैपालाष्टौ द्विको गन्धं शुण्ठी मरिचचित्रकम् । एकः सूतः ससौभाग्यो गोपीजल इति स्मृतः २५॥ शूलव्याध्याश्रयान्गुल्मान्कोष्ठादौ दश पैत्तिकान् । भगन्दरादिहृद्रोगान्नाशयेदेव भक्षणात् ॥ २६ ॥ जमालगोटे ८ भाग, गंधक २ भाग, सोंठ, मिरच, चित्रककी जड़, पारा और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे शूलाश्रित गुल्म, भगन्दर और हृदयरोग नष्ट होते हैं । इसको गोपीजल कहते हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥
भाषाटीकासहित । ( ४०३ ) काङ्कायन गुटिका । शटीं पुष्करमूलञ्च दन्तीं चित्रकमाढकीम् । शृङ्गवेरं वचाञ्चैव पलिकानि समाहरेत् ॥ २७ ॥ त्रिवृतायाः पलञ्चैकं कुर्यात्त्रीणि च हिंगुनः । यवक्षारात्पले द्वे च द्वे पले चाम्लवेतसात् ॥ २८ ॥ यमान्यजाजीमरिचधान्यकञ्च त्रिकार्षिकम् । उपकुंच्याजमोदाभ्यां पृथगर्द्धपलं भवेत् ॥ २९ ॥ मातुलुङ्गरसेनैव गुटिकां कारयेद्भिषक् । तासामेकां पिबेद्द्वे वा तिस्रो वाथ सुखाम्बुना॥३०॥ अम्लैर्मद्यैश्च यूषैश्च घृतेन पयसाथवा । एषा कांकायनेनोक्ता गुटिका गुल्मनाशिनी ॥ ३१ ॥ अर्शोहृद्रोगशमनी क्रिमीणाञ्च विनाशिनी । गोमूत्रयुक्ता शमयेत्कफगुल्मं चिरोत्थितम् ॥ ३२ ॥ क्षीरेण पित्तरोगञ्च मद्यैरम्लैश्च वातिकम् । त्रिफलारसमूत्रैश्च नियच्छेत्सान्निपातिकम् ॥ रक्तगुल्मेषु नारीणामुष्ट्रीक्षीरेण पाययेत् ॥ ३३ ॥ कचूर, कूठ, दंतीकी जड़, चीतेकी जड़, अरहर, सोंठ, वच और निसोधकी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे, हींग ३ पल, जवारखार २ पल, अमलवेत २ पल, अजमोद, जीरा, कालीमिरच और धनिया यह प्रत्येक औषधि तीन तीन कर्ष परिणाम लेवे, काला- जीरा और अजवायन यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले इन सब औष- धियोंको एकत्र करके बिजौरे नींबूके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इसमेंसे एक या दो अथवा तीन गोली किंचित् गरम जल, कांजी, मदिरा, यूष, घृत अथवा दूधके साथ सेवन करे तो गुल्म,
( ४०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बवासीर, हृदयरोग और क्रिमिरोग नष्ट होते हैं । गोमूत्रके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत दिनोंका कफजनित गुल्म रोग नष्ट होता है। दूधके साथ सेवन करनेसे पित्तरोग, मद्य और अम्लके साथ सेवन करनेसे वातरोग, त्रिफलेके रस और गोमूत्रके साथ सेवन करनेसे त्रिदोषज रोग शांत होता है । स्त्रियोंके गुल्मरोगमें इसको ऊंटनीके दूधके साथ सेवन करावे । इसको कांकायन मुनिने कहा है ॥२७-३३॥ गुल्मशार्दूल रस । रसं गन्धं शुद्धलौहं गुग्गुलोः पिप्पलं पलम् । त्रिवृता पिप्पली शुण्ठी शटी धान्यकजीरकम्॥३४ प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं पलार्द्धं कानकं फलम् । संचूर्ण्य वटिका कार्या घृतेन वल्लमानतः ॥ ३५ ॥ वटीद्वयं भक्षयेच्चार्द्रकोष्णाम्बु पिबेदनु । हन्ति प्लीहयकृद्गुल्मकामलोदरशोथकम् ॥ ३६ ॥ वातिकं पैत्तिकं गुल्मं श्लैष्मिकं रौधिरं तथा । गहनानन्दनाथोक्तरसोऽयं गुल्मशार्दुलः ॥ ३७ ॥ पारा, गन्धक, लोहभस्म, गूगल, सुगन्धवाला, निसोथकी जड़, पीपल, सोंठ, कचूर, धनियां और जीरा यह प्रत्येक औषधि एक एक पल, जमाल गोटे २ तोले लेवे इन सब औषधियोंको एकत्र करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । घीके साथ इसकी दो गोली खाकर ऊपरसे अदरखका रस और गरम जल पीवे । इसके सेवन करनेसे प्लीहा, यकृत, गुल्म, कामला, उदरशोथ और वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक और रक्तज गुल्मरोग नष्ट होते हैं । इस गुल्मशार्दूल रसको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३४-३७ ॥ प्राणवल्लभ रस । लौहं ताम्रं वराटञ्च तुत्थं हिंगु फलत्रिकम् । स्नुहीमूलं यवक्षारं जैपालं टङ्कणं त्रिवृत् ॥ ३८ ॥ !
भाषाटीकासहित । (४०५) प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं छागीदुग्धेन पेषयेत् । चतुर्गुञ्जां वटीं खादेद्वारिणा मधुनापि वा ॥ ३९ ॥ प्राणवल्लभनामायं गहनानन्दभाषितः । निहन्ति कामलां पाण्डुं मेहं हिक्कां विशेषतः॥४०॥ असाध्यं सन्निपातञ्च गुल्मं रुधिरसम्भवम् । वातरक्तञ्च कुष्ठञ्च कण्डूविस्फोटकापचीम् ॥ ४१ ॥ लोहाभस्म, तांवाभस्म, कौड़ीकी भस्म, तूतिया, हींग, त्रिफला, थूहरकी मूल, जवाखार, जमालगोटे, सुहागा और निसोध यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर बकरीके दूधमें पीसकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको सहत अथवा जलके साथ सेवन करनेसे कामला, पांडु, प्रमेह, हिक्का, असाध्य सन्निपात, रक्तज गुल्म, वातरक्त, कुष्ठ, कण्डू, विस्फोट क और अपची रोग नष्ट होते हैं । इस प्राणवल्लभ रसको गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३८-४१ ॥ सर्वेश्वर रस । ताम्रं दशगुणं स्वर्णात्स्वर्णपादं कटुत्रिकम् । त्रिकटु त्रिफला तुल्या त्रिफलार्द्धमयोरजः ॥ ४२ ॥ अयसोऽर्द्धं विषञ्चैव सर्वं संमर्द्य यत्नतः । सर्वेश्वररसो नाम रौधिरगुल्मनाशनः ॥ ४३ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे गुल्मरोगचिकित्सा । तांबाभस्म १० भाग, सोनाभस्म १ भाग, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा और आमले यह प्रत्येक औषधि सोनेसे चौथाई भाग, लोहेका चूर्ण त्रिफलेसे आधा भाग और लोहेसे आधा भाग विष लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके सेवन करनेसे रक्तजगुल्म रोग नष्ट होता है । इसको सर्वेश्वर रस कहते हैं ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ इति गुल्मरोगचिकित्सा ।
( ४०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ हृद्रोगाधिकार । हृदयार्णव रस । शुद्धसूतं समं गन्धं मृतताम्रं तयोः समम् । मर्दयेत्त्रिफलाक्वाथैः काकमाचीद्रवैर्दिनम् ॥ १ ॥ चणमात्रां वटीं खादेद्रसोऽयं हृदयार्णवः । काकमाचीफलं कर्षं त्रिफलाफलसंयुतम् ॥ २ ॥ द्वात्रिंशत्तोलकं तोयं क्वाथमष्टावशेषितम् । अनुपानं पिबेच्चात्र हृद्रोगे च कफोत्थिते ॥ ३ ॥ पारा १ भाग, गंधक १ भाग, तांबाभस्म २ भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र करके त्रिफलेके क्वाथमें और मकोयके रसमें एक दिन- तक खरल करे। पश्चात् चनेकी बराबर गोली बना लेवे। इस औष- धिके सेवन करनेके पश्चात् एक तोला मकोय और १ तोले त्रिफ- लेको बत्तीस तोले जलमें पकावे; जब पकते पकते जल आठवां भाग बाकी रह जाय तब उतारकर छानके पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे कफजन्य हृदयरोग दूर होता है । इसको हृदयार्णव रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ नागार्जुनाभ्रक । सहस्रपुटनैः शुद्धं वज्राभ्रमर्जुनत्वचः । सत्त्वैर्विमर्दितः सप्तदिनं खल्ले विशोषितम् ॥ ४ ॥ छायाशुष्का वटी कार्या नाम्नेदमर्जुनाह्वयम् । हद्रोगं सर्वशूलार्शोहल्लासच्छर्द्यरोचकान् ॥ ५ ॥ अतीसारमग्निमान्द्यं रक्तपित्तं क्षतक्षयम् । शोथोदराम्लपित्तञ्च विषमज्वरमेव च ॥ हन्त्यन्यान्यपि रोगाणि बल्यं वृष्यं रसायनम् ॥६॥
सहस्र पुटसे शुरू किया हुआ वज्राभ्रक लेकर अर्जुनकी छालके क्वाथमें सात भावना देकर गोली बनाकर छायामें सुखा लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे हृदयरोग, सर्व प्रकारका शूल, बवासीर, हल्लास, वमन, अरुचि, अतिसार, मंदाग्नि, रक्तपित्त, क्षतक्षय, शोथ, उदररोग,अम्लपित्त और विषमज्वर नष्ट होते हैं। इसके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होकर बल, वीर्य और रसकी वृद्धि होती है । इसको नागार्जुनाभ्रक कहते हैं ॥ ४-६ ॥ पञ्चानन रस । सूतगन्धौ द्रवैर्धात्र्या मर्दयेद् गोस्तनीद्रवैः । यष्टिखर्जूरसलिलैर्दिनं च परिमर्दयेत् ॥ धात्रीचूर्णं सिताञ्चानु पिबेद्ध्रद्रोगशान्तये ॥ ७ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे हृद्रोगाधिकार । पारे और गंधक दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर आमलोंके रस, दाख, मुलैठीके रस और खजूरके क्वाथमें पृथक् पृथक् खरल करके चूर्ण बनावे, इसको उचित मात्रासे आमलेके चूर्ण और मिसरीके साथ सेवन करे तो हृद्रोग दूर होता है । इसको पञ्चानन रस कहते हैं ॥ ७ ॥ इति हृद्रोगाधिकार संपूर्ण । अथ मूत्रकृच्छ्राधिकार । त्रिनेत्राख्य रस । वङ्गं सूतं गन्धकं भावयित्वा लौहे पात्रे मर्दयेदेक- घस्रम् । दूर्वायष्टीगोक्षुरैः शाल्मलीभिर्मूषामध्ये भूधरे पाचयित्वा ॥ १ ॥ तत्तद्भावैर्भावयित्वास्य वल्लं दद्याच्छीतं पायसं वक्ष्यमाणम् । दूर्वायष्टी- शाल्मलीतोयदुग्धैस्तुल्यैः कुर्यात्पायसं तद्ददीत ।
( ४०८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रातःकाले शीतपानीयपानान्मूत्रे जाते स्यात्सुखी च क्रमेण ॥ २ ॥ वंगभस्म, पारा और गंधक इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर लोहेके पात्रमें दूर्वा, मुलैठी, गोखरू और सेमलकी जड़के रसमें अलग अलग खरल करके मूषामें रखकर भूधरयंत्रमें पकावे । पश्चात् उपरोक्त दूब आदिके रसमें सात सात भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । पश्चात् दूब,मुलैठी और सेमलकी जड़का काथ और दूध यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर खीर बनाकर औषधि सेवन करनेके पश्चात् सेवन करे और प्रातःकाल शीतल जलको पीवे । इसके सेवन करनेसे अच्छे प्रकारसे खुलकर साफ पेशाब होता है और रोगी अच्छे प्रकारसे चलने फिरनेको समर्थ होता है । इसको त्रिनेत्राख्य रस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ वरुणाद्य लौह । द्विपलं वरुणं धात्र्यास्तदर्द्धं धातृपुष्पकम् । हरीतक्याः पलार्द्धञ्च पृश्निपर्णी तदर्द्धकम् ॥ ३ ॥ कर्षमानञ्च लौहाभ्रं चूर्णमेकत्र कारयेत् । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय शाणमानं विधानवित् ॥ ४ ॥ मूत्राघातं तथा घोरं मूत्रकृच्छ्रञ्च दारुणम् । अश्मरीं विनिहंत्याशु प्रमेहं विषमज्वरम् ॥ ५ ॥ बलपुष्टिकरञ्चैव वृष्यमायुष्यमेव च । वरुणाद्यमिदं लौहं चरकेण विनिर्मितम् ॥ ६ ॥ बरनेकी छाल २ पल, आमले २ पल, धायके फूल १ पल, हरड़ २ तोले, पृश्निपर्णी, लोहाभस्म और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक कर्ष परिमाण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके प्रतिदिन प्रातःकाल चार मासे परिमाण भक्षण करे । इस
भाषाटीकासहित । (४०९) औषधिके सेवन करनेसे अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, प्रमेह और विषमज्वर नष्ट होकर बल, पुष्टि, वीर्य और आयुकी वृद्धि होती है । यह वरुणाद्य लोह चरकाचार्यने कहा है ॥ ३-६ ॥ अयोरजः श्लक्ष्णपिष्टं मधुना सह योजयेत् । मूत्राघातं निहन्त्याशु मूत्रकृच्छ्रं सुदारुणम् ॥ ७ ॥ लोहभस्मके चूर्णको अत्यन्त बारीक पीसकर सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे मूत्राघात और दारुण मूत्रकृच्छ्र रोग दूर होते हैं ॥ ७ ॥ रसगन्धयवक्षारं सितातक्रयुतं पिबेत् । मूत्रकृच्छ्रान्यशेषाणि निहन्ति नियतं नृणाम् ॥ ८ ॥ पारा और गन्धक, दोनोंको समान भाग लेकर कज्जली बना लेवे । फिर उसमें पारेकी बराबर जवाखार मिलाकर मिश्री और तक्रके साथ सेवन करे तो अनेक प्रकारका मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥ भैषज्यैरश्मरीप्रोक्तैर्मूत्रकृच्छ्रमुपाचरेत् । योगवाहिरसैर्वापि चानुपानविशेषतः ॥ ९ ॥ अश्मरी रोगमें जो औषधि कही है वह सब औषधि इस मूत्रकृच्छ्र रोगमें भी प्रयुक्त करनी चाहिये । अथवा समस्त योगवाही रसोंको अनुपान विशेषोंके साथ सेवन करावे ॥ ९ ॥ मूत्रकृच्छ्रान्तक रस । शतावरीरसैः पिष्ट्वा मृतसूतञ्च तालकम् । शिखितुत्थञ्च तुल्यांशं दिनैकं मर्दयेद्दृढम् ॥ १० ॥ तद्गोलं सार्षपे तैले पाच्यं यामञ्च चूर्णयेत् । मूत्रकृच्छ्रान्तकश्चास्य क्षौद्रैर्गुञ्जाचतुष्टयम् ॥ ११ ॥ भक्षणान्नात्र सन्देहो मूत्रकृच्छ्रं निहन्त्यलम् ।
( ४१० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तुलसीतिलपिण्याकं बिल्वमूलं तुषाम्बुना ॥ कर्षैकं वानुपानेन सुरया वा सुवर्चलैः ॥ १२ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे मूत्रकृच्छ्राधिकारः । रससिन्दूर और हरिताल इन दोनोंको समान भाग लेकर सतावरके रसमें खरल करके पश्चात् उसमें रससिन्दूरकी बराबर तूतिया मिला- कर एक दिनतक खरल करके गोला बना लेवे । पश्चात् इस गोलेको सरसोंके तेलमें एक प्रहरतक पकाकर चूर्ण कर लेवे । सहतके साथ इस औषधिको चार रत्ती परिमाण लेकर सेवन करे तो मूत्रकृच्छ्र रोग दूर हो जाता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें तुलसीके पत्ते, तिलकी खली और बेलकी जड़ इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर पीसकर कांजीमें मिलाकर एक कर्ष परिमाण सेवन करे । अथवा काले नमकको मदिराके साथ सेवन करे । इसको मूत्रकृच्छा- न्तक रस कहते हैं ॥ १०–१२ ॥ इति मूत्रकृच्छ्ररोगाधिकार सम्पूर्ण । अथ मूत्राघाताधिकार । तारकेश्वर रस । मृतसूताभ्रगन्धं च मर्दयेन्मधुना दिनम् । तारकेश्वरनामायं गहनानन्दभाषितः ॥ १ ॥ माषमात्रं भजेत्क्षौद्रैर्बहुमूत्रप्रशान्तये । उदुम्बरफलं पक्वं चूर्णितं कर्षमात्रकम् ॥ संलिह्यान्मधुना सार्द्धमनुपानं सुखावहम् ॥ २ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म और गन्धक इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर सहतमें एक दिनतक खरल करके एक मासे परिमाण औषधि सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे मूत्राघातरोग दूर होता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें पक्व गूलरको पीसकर एक तोला सहतमें मिलाकर भक्षण करे ॥ १ ॥ २ ॥
भाषाटीकासहित । (४११) लघुलोकेश्वर रस । शुद्धसूतस्य भागैकश्चत्वारः शुद्धगन्धकात् । पिष्ट्वा वराटिका पूर्या रसपादेन टंकणम् ॥ ३ ॥ क्षीरैः पिष्ट्वा मुखं लिप्त्वा भाण्डे रुद्ध्वा पुटे पचेत् । स्वाङ्गशीतं विचूर्ण्याथ लघुलोकेश्वरो मतः ॥ ४ ॥ चतुर्गुआप्रमाणन्तु मरिचेन तथैव च । जातीमूलफलैर्युक्तमजाक्षीरेण पाययेत् ॥ शर्कराभावितञ्चानु पीत्वा कृच्छ्रहरः परः ॥ ५ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गन्धक ४ भाग लेवे, दोनोंको एकत्र खरल करके कौड़ीमें भर देवे, फिर पारेसे चौथाई भाग सुहागा लेकर दूधमें पीसकर उससे कौड़ीके मुखको बन्द कर देवे । फिर उस कौड़ीको मूषामें रखकर और उसको अच्छे प्रकारसे कपरमिट्टीसे बन्द करके पुटपाकसे पकावे । जब शीतल होजाय तब इसका चूर्ण करके चार रत्ती परिमाण लेकर चार रत्ती काली मिरचोंका चूर्ण, चार रत्ती चमेलीकी जड़का चूर्ण और चार रत्ती जायफलका चूर्ण इन सबको एकत्र करके बकरीके दूध और मिश्रीके साथ पान करे तो मूत्रकृच्छ्र रोग दूर होता है । इसको लघुलोकेश्वर रस कहते हैं ॥ ३-५ ॥ अन्य योग । येनौषधेन मतिमान्मूत्रकृच्छ्रमुपाचरेत् । तेनौषधेन श्रेष्ठेन मूत्राघातानुपाचरेत् ॥ ६ ॥ जो औषधि मूत्रकृच्छ्र रोगकी कही हैं वे सब औषधि मूत्राघात रोगमें भी प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ६ ॥ लवणाम्लवरायुक्तं घृतञ्चापि पिबेन्नरः । तस्य नश्यन्ति वेगेन मूत्राघातास्त्रयोदश ॥ ७ ॥
( ४१२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सेंधानमक, कांजी और त्रिफलेका चूर्ण इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर घृतके साथ सेवन करनेसे त्रयोदश प्रकारका मूत्रा- घातरोग दूर होता है ॥ ७ ॥ पक्वमिर्वारुबीजानामक्षमात्रं ससैन्धवम् । धान्याम्लयुक्तं पीत्वैव मूत्राघाताद्विमुच्यते ॥ ८ ॥ पकी हुई ककड़ीके बीजोंको ( अथवा खीरेके बीजोंको ) एक तोला परिमाण लेकर सेंधानमक और कांजीके साथ सेवन करनेसे मूत्राघात रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥ गोखरुआदि योग । त्रिकण्टकैरण्डशतावरीभिः सिद्धं पयो वा तृण- पञ्चमूलैः । गुडप्रगाढं सघृतं पयो वा रोगेषु कृच्छ्रादिषु शस्तमेतत् ॥ ९ ॥ गोखरू, एरंडकी जड़ और सतावर इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर दूधमें पकाकर उस दूधको पान करे । अथवा तृणपंचमूल ( कुशा, काँस, रामसर, डाभ और ईख ) के द्वारा सिद्ध किये हुए दूधको या गुड़सहित घी मिले हुए दूधको इस मूत्रकृच्छ्र और मूत्राघात रोगमें प्रयोग करना चाहिये ॥ ९ ॥ इति मूत्राघातरोगचिकित्सा । अथ अश्मरीरोगचिकित्सा । पाषाणवज्र रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं रसैः श्वेतपुनर्नवैः । मर्दयित्वा दिनं खल्ले रुद्ध्वा तद्भूधरे पचेत् ॥ १ ॥ दिनान्ते तत्समुद्धृत्य मर्दयेद् गुडसंयुतम् । अश्मरीं बस्तिशूलञ्च हन्ति पाषाणवज्रकः ॥ २ ॥
भाषाटीकासहित । ( ४१३ ) गोरक्षकर्कटीमूलक्वाथं कौलत्थकं तथा । अनुपानं प्रयोक्तव्यं बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ३ ॥ पारा १ भाग और गंधक २ भाग दोनोंको एकत्र पीसकर कज्जली बना लेवे । फिर सफेद विषखपरेके रसमें एक दिनतक खरल करके मूषामें रखकर संधिस्थानों ( जोड़ों ) को अच्छे प्रकारसे बंद करके भूधरयंत्रमें एक दिनतक पकावे । फिर इसको चूर्ण करके गुड़के साथ सेवन करनेसे अश्मरी ( पथरी ) और बस्तिशूल नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें गोरखककडी ( एरण्डककडी ) का क्वाथ; अथवा कुलथीका क्वाथ पान करे । अथवा दोषोंका बलाबल विचार कर अनुपानकी कल्पना करे । इसको पाषाणवज्र रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ त्रिविक्रमरस । मृतताम्रमजाक्षीरैः पाच्यं तुल्यं गते द्रवे । तत्ताम्रं शुद्धसूतञ्च गन्धकञ्च समं समम् ॥ ४ ॥ निर्गुण्डीस्वरसैर्मर्द्द्यैदिनं तद्गोलकीकृतम् । यामैकं वालुकायन्त्रे पक्त्वा योज्यं द्विगुञ्जकम् ॥५॥ बीजपूरस्य मूलञ्च सजलञ्चानुपाययेत् । रसस्त्रिविक्रमो नाम शर्करामश्मरीं जयेत् ॥ ६ ॥ तांबेकी भस्मको बराबरके बकरीके दूधमें पकावे । जब वह पककर गाढा हो जाय तब तांबेकी बराबर पारा और समान गंधक मिलाकर सम्हालूके रसमें एक दिनतक खरल करके गोला बना लेवे । फिर उस गोलेको एक मूषा ( घडिया ) में रखकर ऊपरसे कपरोटी करके एक प्रहरतक वालुका यंत्रमें पकावे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर बिजौरे नींबूकी जडके चूर्ण और जलके साथ सेवन करे, इससे शर्करा और अश्मरी रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिविक्रम रस कहते हैं ॥ ४-६ ॥
( ४१४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लोहप्रयोग । अयोरजः श्लक्ष्णपिष्टं मधुना सह योजितम् । अश्मरीं विनिहन्त्याशु मूत्रकृच्छ्रञ्च दारुणम् ॥ ७ ॥ लोहभस्मको बारीक पीसकर सहतके साथ सेवन करनेसे अश्मरी और मूत्रकृच्छ्र रोग दूर होते हैं ॥ ७ ॥ अन्य योग । इन्द्रवारुणिकामूलं मरिचं क्षीरपाचितम् । पर्पटीरससंयुक्तं सप्ताहादश्मरीं जयेत् ॥ ८ ॥ इन्द्रायणकी जड़ और काली मिरचोंको दूधमें पकावे । फिर दोनोंको अच्छे प्रकारसे मर्दन करके पित्तपापड़ेके रसके साथ एक सप्ताह पर्यंत सेवन करनेसे अश्मरी रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥ गंधकादियोग । गन्धकं जीरकं क्षुद्राफलं क्षारद्वयं सदा । अश्मरीं शर्करां मूत्रकृच्छ्रं क्षपयति ध्रुवम् ॥ ९ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अश्मर्य्यधिकारः । गंधक, जीरा, कटेरीके फल, सज्जीक्षार और जवाखार इन सबको एकत्र पीसकर भक्षण करनेसे शर्करा और मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होते हैं ॥९॥ इति अश्मरीरोगचिकित्सा । अथ प्रमेहाधिकार । हरिशंकररस । मृतसूताभ्रकं तुल्यं धात्रीफलनिशाद्रवैः । सप्ताहं भावयेत्खल्ले योगोऽयं हरिशंकरः ॥ माषमात्रां वटीं खादेत्सर्वमेहप्रशान्तये ॥ १ ॥ रससिन्दूर और अभ्रकभस्म दोनोंको समान भाग लेकर आमला और हल्दीके रसमें सात वार भावना देकर एक एक मासेकी गोली बना
४. चतुर्थ-पञ्चम अध्याय: कुष्ठ, प्रमेह, विसर्प, विष-चिकित्सा, रसायन-वाजीकरण एवं उपसंहार
भाषाटीकासहित । ( ४१६ ) लेवे इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारका प्रमेह रोग नष्ट होता है । इसको हरिशंकर रस कहते हैं ॥ १ ॥ इन्द्रवटी । मृतं सूतं मृतं वङ्ग-मर्जुनस्य त्वचान्वितम् । तुल्यांशं मर्दयेत्खल्ले शाल्मल्या मूलजैर्द्रवैः ॥ २ ॥ दिनान्ते वटिका कार्या माषमात्रा प्रमेहहा । एषा इन्द्रवटी नाम्ना मधुमेहप्रशान्तिकृत् ॥ ३ ॥ रससिन्दूर, वंगभस्म और अर्जुनवृक्षकी छाल समान भाग लेकर सेमलकी जड़के रसमें एक दिनतक खरल करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारका प्रमेह और मधुमेह नष्ट होता है ॥ २ ॥ ३ ॥ वङ्गावलेह । वंगभस्म द्विवल्लञ्च लेहयेन्मधुना सह । ततो गुडसमं गन्धं भक्षयेत्कर्षमात्रकम् ॥ ४ ॥ गुडूचीसत्त्वमथवा शर्करासहितं तथा । सर्वमेहहरो ज्ञेयो वङ्गावलेह उत्तमः ॥ ५ ॥ चार रत्ती परिमाण वंगकी भस्मको सहतमें मिलाकर चाटे और ऊपरसे एक कर्ष परिमाण गुड़ और गंधक भक्षण करे । अथवा एक तोला गिलोयका सत और मिश्री दोनोंको एकत्र मिलाकर भक्षण करे । इसके सेवन करनेसे सब प्रकारका प्रमेहरोग दूर होता है । इसको वंगावलेह कहते हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥ प्रमेहसेतु । सूताभ्रञ्च वटक्षीरैर्मर्दयेत्प्रहरद्वयम् । विशोष्य पक्वमूषायां सर्वरोगे प्रयोजयेत् ॥ ६ ॥